देश के सर्वाधिक कुपोषित क्षेत्र बस्तर में केवल पोषण आहार बांटना नाकाफी

 


जगदलपुर, 15 सितंबर (हि.स.)। बस्तर ज़िला लंबे समय से कुपोषण की गंभीर चुनौती से जूझ रहा है। महिला एवं बाल विकास विभाग के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, बस्तर में कुपोषण की दर में बीते वर्षों की तुलना में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। राज्य गठन के समय जहां बस्तर में कुपोषण की दर 52 प्रतिशत थी, वहीं मार्च 2024 तक यह घटकर 22 प्रतिशत पर आई और अब यह गिरकर 17 प्रतिशत पहुंच गई है।

इस सुधार के बावजूद, ज़मीनी धरातल पर स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है। आंकड़ों का दूसरा पहलू यह दिखाता है कि बस्तर ज़िले में आज भी 13,700 से अधिक बच्चे कुपोषित हैं। देश के सर्वाधिक कुपोषित क्षेत्रों में बस्तर का नाम बने रहना यह संकेत देता है, कि केवल पोषण आहार बांटना ही काफी नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं, स्वच्छता और स्थानीय बीमारियों की रोकथाम पर एकीकृत रणनीति के साथ काम करने की तत्काल आवश्यकता है।

मिली जानकारी के अनुसार बस्तर ज़िले के लगभग दाे हजार आंगनबाड़ी केंद्रों में 81 हजार बच्चे पंजीकृत हैं। पंजीकृत बच्चों में से 13,700 से अधिक बच्चे कुपोषित चिह्नित किए गए हैं। ज़िले के बस्तानार, दरभा और बकावंड विकासखंडों में अन्य ब्लॉकों की तुलना में कुपोषण का प्रभाव सबसे अधिक है। अखिल राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन सर्वे के अनुसार, पड़ोसी ज़िले सुकमा में 57% से अधिक बच्चे कुपोषित हैं, जो पूरे अंचल की गंभीर स्थिति को दर्शाता है। आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की स्थिति कुपोषण मामले में अभी भी बेहद संवेदनशील बनी हुई है। कुपोषण को जड़ से समाप्त करने के प्रयास ज़मीनी स्तर पर पूरी तरह प्रभावी क्यों नहीं दिख रहे हैं।

महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी मनोज सिंहा के अनुसार, विभाग कुपोषण की दर को कम करने के लिए लगातार प्रयासरत है। हालांकि, इस लड़ाई में कई प्रशासनिक और स्थानीय चुनौतियां आड़े आ रही है। उन्हाेने बताया कि बस्तर में मलेरिया और अन्य संक्रामक बीमारियों के प्रकोप के कारण बच्चों का स्वास्थ्य तेज़ी से गिरता है, जिससे वे आसानी से कुपोषण का शिकार हो जाते हैं। बच्चों में कम वजन, दुबलापन, बौनापन के साथ-साथ ‘अति गंभीर कुपोषित’ श्रेणी की समस्या बनी हुई है।

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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे