बस्तर की समृद्ध विरासत बारिश से बचाने वाली छतड़ी अब तस्वीर में सिमटी

 


जगदलपुर, 06 जुलाई (हि.स.)। बस्तर के ग्रामीण अंचलों में मानसून के बारिश से बचने के लिए पारंपरिक छतड़ी की जगह खेतों की मेड़ों पर प्लास्टिक और सिंथेटिक कपड़े वाले छाते ही नजर आते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि छाते बाजार में बहुत सस्ते और आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं, जबकि पारंपरिक छतड़ी बनाने में समय और श्रम अधिक लगता है। बाजार की इस चमक-धमक के बीच ग्रामीणों की स्थानीय कारीगरी की कला पूरी तरह से दम तोड़ चुकी है। आने वाली पीढिय़ां अपनी इस समृद्ध विरासत को केवल पुरानी तस्वीरों में ही देख पाएंगी।

बस्तर की पहचान यहां की आदिम संस्कृति और प्रकृति के साथ जुड़ाव से है। लेकिन, बदलते दौर के साथ अब यहां की जीवन शैली में भी बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। मानसून के आते ही बस्तर के जंगलों में कभी सरगी के पत्तों और बांस की खपचियों से तैयार की जाने वाली पारंपरिक छतड़ी गर्व से तनी दिखती थी, लेकिन अब इन छतड़ियों की जगह रंग-बिरंगे छातों ने ले ली है। बस्तर के ग्रामीणों के लिए पहले छाता केवल बारिश से बचने का साधन नहीं था, बल्कि यह उनके हुनर की मिसाल था। ग्रामीण बांस और साल (सरगी) के पत्तों से बेहतरीन जल-रोधी छतड़ियां बुनते थे। ये छतड़ियां न केवल टिकाऊ होती थीं, बल्कि पूरी तरह से इको-फ्रेंडली (पर्यावरण के अनुकूल) भी थीं। खेती-किसानी के दौरान ये छतरियां किसानों की सबसे बड़ी साथी हुआ करती थीं।

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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे