पीर दमड़िया खानकाह के सज्जादानशीन उज़्बेकिस्तान दौरा

 


भागलपुर, 20 मई (हि.स.)। पीर दमड़िया खानकाह के सज्जादानशीन, प्रसिद्ध आलिम-ए-दीन, रूहानी व सामाजिक शख्सियत हज़रत मौलाना सैयद शाह फ़ख़रे आलम हसन इन दिनों मध्य एशिया के ऐतिहासिक, धार्मिक और रूहानी सफ़र पर हैं।

इसी सिलसिले में वह इस समय उज़्बेकिस्तान के महान और ऐतिहासिक शहर समरकंद तथा उसके निकटवर्ती क्षेत्र खरतंग में मौजूद हैं, जहां महान मुहद्दिस, इमामुल मुहद्दिसीन, अमीरुल मोमिनीन फ़िल हदीस हज़रत इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाह अलैह का मज़ार-ए-अक़दस स्थित है।

समरकंद इस्लामी इतिहास, तहज़ीब, इल्म, कला और रूहानियत का एक महान केंद्र रहा है। सदियों तक यह शहर उलेमा, फ़ुक़हा, मुहद्दिसीन, सूफ़िया और बुद्धिजीवियों का केंद्र रहा। इसी धरती ने उम्मत-ए-मुस्लिमा को अनेक महान धार्मिक और विद्वान हस्तियाँ प्रदान कीं। आज भी यहां की फ़िज़ा में इस्लामी तहज़ीब, इल्मी गरिमा और रूहानी महानता की झलक स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती है। यहां के प्राचीन मदरसे, ऐतिहासिक मस्जिदें, नीले गुम्बद और इस्लामी स्थापत्य कला की भव्यता हर आने वाले को प्रभावित करती है।

हज़रत मौलाना सैयद शाह फ़ख़र आलम हसन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यह स्थान केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा के लिए एक रूहानी केंद्र की हैसियत रखता है, क्योंकि यहां वह महान हस्ती आराम फ़रमा हैं जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी अहादीस-ए-नबी की हिफाज़त के लिए समर्पित कर दी।

मौलाना साहब ने बताया कि उज़्बेकिस्तान सरकार ने हज़रत इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाह अलैह के मज़ार मुबारक के निकट एक अत्यंत भव्य और सुंदर मस्जिद का निर्माण कराया है, जो आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है और जिसमें एक साथ लगभग पचास हज़ार नमाज़ी नमाज़ अदा कर सकते हैं। इस मस्जिद की स्थापत्य शैली इस्लामी वास्तुकला का शानदार नमूना प्रस्तुत करती है।

इसके विशाल प्रांगण, ऊंचे मीनार, सुंदर गुम्बद और शांत वातावरण ज़ायरीन के दिलों पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। उन्होंने आगे कहा कि इस पूरे क्षेत्र में ज़ायरीन के ठहरने के लिए बेहतरीन व्यवस्थाएं मौजूद हैं, ताकि दुनिया भर से आने वाले लोग यहां ठहर सकें, हज़रत इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाह अलैह के मज़ार-ए-अक़दस पर हाज़िरी दे सकें और इस रूहानी माहौल से फ़ैज़ हासिल कर सकें।

हज़रत मौलाना सैयद शाह फ़ख़र आलम हसन साहब ने अपने जज़्बात का इज़हार करते हुए कहा कि यहां की फ़िज़ा में एक विशेष रूहानियत, सुकून, रहमत और दिली इत्मीनान महसूस होता है। निस्संदेह यह हज़रत इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाह अलैह के इख़लास, ज़ुह्द, तक़वा, उलूम-ए-नबुव्वत से गहरी वाबस्तगी और ख़िदमत-ए-हदीस की बरकतों का असर है, जो आज भी इस सरज़मीन पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

हज़रत मौलाना ने अपने तमाम मुतअल्लिक़ीन, अहबाब, अकीदतमंदों और पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा की ओर से हज़रत इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाह अलैह के मज़ार-ए-अक़दस पर सलाम पेश किया तथा उम्मत की भलाई, एकता, अमन, दीनी बेदारी, वतन-ए-अज़ीज़ की सलामती, आपसी भाईचारा, मेल-जोल और देश की तरक़्क़ी के लिए विशेष दुआएँ कीं। अंत में उन्होंने दुआ की कि अल्लाह तआला हज़रत इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाह अलैह के दर्जात को बुलंद से बुलंदतर फ़रमाए, उनकी क़ब्र-ए-अनवर को नूर से भर दे, जन्नतुल फ़िरदौस में आला मुक़ाम अता फ़रमाए और उम्मत-ए-मुस्लिमा को क़ुरआन व सुन्नत के साथ मज़बूत रिश्ता नसीब फ़रमाए।

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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर