(विस्तृत) टीएमबीयू में दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार शुरू: ग्रामीण युवाओं को कुशल बनाकर ही साकार होगा विकसित भारत का सपना

 




भागलपुर, 04 नवंबर (हि.स.)।बिहार में भागलपुर जिले के तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (टीएमबीयू) के ओल्ड पीजी परिसर स्थित बहुउद्देशीय सभागार में बुधवार को दो दिवसीय बहुविषयक राष्ट्रीय सेमिनार का शानदार आगाज हुआ।

विश्वविद्यालय के ग्रामीण अर्थशास्त्र एवं सहकारिता प्रबंधन विभाग तथा औद्योगिक संबंध एवं कार्मिक प्रबंधन विभाग (आईआरपीएम) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस संगोष्ठी का मुख्य विषय 'विकसित भारत @ 2047 के लिए समावेशी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मानव संसाधन विकास' है।

कार्यक्रम में एग्रो-इकोनॉमिक्स रिसर्च सेंटर एवं एमबीए विभाग का अकादमिक सहयोग रहा। सेमिनार का उद्घाटन मुख्य अतिथि प्रभारी कुलपति व विज्ञान संकायाध्यक्ष प्रो. रंजना दुबे, सामाजिक विज्ञान संकायाध्यक्ष प्रो. अर्चना कुमारी साह, पूर्व प्रभारी कुलपति प्रो. क्षेमेंद्र कुमार सिंह, पूर्व कुलपति प्रो. उग्र मोहन झा, एग्रो रिसर्च के पूर्व निदेशक प्रो. बालकृष्ण झा, शिक्षाविद् डॉ. राजीव कांत मिश्रा, शांतिनिकेतन से आए मुख्य वक्ता प्रो. देवाशीष सरकार, पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. रामसेवक सिंह, प्रो. सी.पी. सिंह, प्रो. सुदामा यादव, संयोजक द्वय प्रो. राजेश कुमार मिश्रा व प्रो. निर्मला कुमारी तथा आयोजन सचिव डॉ. अश्वजीत राठौर ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया।

अतिथियों का स्वागत प्रो. निर्मला कुमारी ने किया, जबकि विषय प्रवेश कराते हुए डॉ. अश्वजीत राठौड़ ने सेमिनार के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। विश्व भारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन (पश्चिम बंगाल) से आए मुख्य वक्ता प्रो. देवाशीष सरकार ने अपने व्याख्यान में कहा कि देश की आजादी के समय जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी 50 फीसदी थी, जो आज घटकर लगभग 15 फीसदी रह गई है। इसके विपरीत, ग्रामीण श्रमिक बल की भागीदारी बढ़कर 67 फीसदी तक पहुंच चुकी है। उन्होंने वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के संकल्प को पूरा करने के लिए चार कालखंडों की रणनीति सुझाई। उन्होंने कहा कि प्रथम चरण (2026-31): सूचना एवं सांख्यिकी की विश्वसनीय नींव मजबूत करना।

द्वितीय चरण (2031-35): कौशल विकास, उत्पादकता और अप्रेंटिसशिप को बढ़ावा देना। तृतीय चरण (2036-40): स्थानीय उद्यमियों और मूल्य श्रृंखला (वैल्यू चेन) को सुदृढ़ करना और अंतिम चरण (2041-47): ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर गुणवत्तापूर्ण रोजगार का सृजन करना। विशिष्ट अतिथि डॉ. राजीव कांत मिश्रा ने भागलपुर के जीआई टैग प्राप्त उत्पादों—कतरनी चूड़ा, जर्दालू आम और तसर सिल्क को बेहतर वैश्विक बाजार उपलब्ध कराने की वकालत की। पूर्व प्रभारी कुलपति प्रो. क्षेमेंद्र कुमार सिंह ने इंसानों को कुशल 'संसाधन' के रूप में बदलने की जरूरत बताई, तो वहीं डॉ. उग्रमोहन झा ने योजना, क्रियान्वयन एजेंसी और हितधारकों के बीच त्रिकोणीय समन्वय पर बल दिया।

प्रो. रामसेवक सिंह ने मांग आधारित प्रशिक्षण, प्रो. सी.पी. सिंह ने अन्नदाता, युवा व महिला को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने तथा प्रो. सुदामा यादव ने स्वास्थ्य एवं पोषण में सुधार कर युवा आबादी को कुशल बनाने की बात कही। सत्र की अध्यक्षता प्रो. राजेश कुमार मिश्रा ने की और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रंजन कुमार सिन्हा ने किया। उद्घाटन के बाद आयोजित तकनीकी सत्रों में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए विशेषज्ञों व शोधार्थियों ने शोध पत्र प्रस्तुत किए। इनमें मुख्य रूप से 'ह्यूमन कैपिटल फॉर्मेशन: एजुकेशन, हेल्थ एवं स्किल डेवलपमेंट' और 'इंस्टीट्यूशंस फॉर इंक्लूजन: को-ऑपरेटिव्स, सेल्फ हेल्प ग्रुप्स एवं फाइनेंशियल इंक्लूजन' जैसे गंभीर विषयों पर मंथन हुआ। सत्र की अध्यक्षता प्रो. रामसेवक सिंह व प्रो. सी.पी. सिंह ने की, जबकि सह-अध्यक्ष की भूमिका में डॉ. रवि शंकर कुमार चौधरी व डॉ. नमन कुमार रहे। रिपोर्टियर की जिम्मेदारी डॉ. महादेव कुमार व डॉ. अभिषेक कुमार ने निभाई और छात्र कोऑर्डिनेटर के रूप में डॉ. देवेंद्र कुमार सक्रिय रहे। संपूर्ण कार्यक्रम की जानकारी मीडिया प्रभारी डॉ. रविशंकर कुमार चौधरी ने दी। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के अध्यक्ष, प्राचार्य, शिक्षक और बड़ी संख्या में शोधार्थी व छात्र उपस्थित थे।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर