मानसून की दगाबाजी, निजी बोरिंग के सहारे जैसे-तैसे धान की बुआई करने को मजबूर किसान
भागलपुर, 29 जुलाई (हि.स.)। जिले में इस वर्ष मानसूनी बारिश में भारी कमी देखी जा रही है, जिसने सीधे तौर पर खरीफ सीजन की खेती को संकट में डाल दिया है। जिले के अधिकांश क्षेत्रों में मानसून की सुस्ती के कारण धान की बुआई और रोपनी का काम पूरी तरह प्रभावित हुआ है।
आसमान में छिटपुट बादलों की आवाजाही के बीच किसान टकटकी लगाए बैठे हैं, लेकिन पर्याप्त बारिश न होने से अधिकतर खेत सूखे और खाली पड़े हैं। भागलपुर जिले के गोराडीह, जगदीशपुर, पिरपैंती और कहलगांव सहित अन्य प्रखंडों की कमोबेश यही स्थिति बनी हुई है। इन इलाकों के खेतों में जहाँ इस समय धान की हरी-भरी पौध और पानी लबालब होना चाहिए था, वहाँ आज खेत सूखे पड़े हैं। खेतों में नमी की कमी के कारण धान के बिचड़े भी सूखने की कगार पर पहुँच गए हैं।
इस भीषण जल संकट के बीच सिंचाई व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। वर्तमान में जिस किसान के पास निजी बोरिंग या पंपिंग सेट की सुविधा है, वे जैसे-तैसे पानी का इंतजाम कर धान की बुआई और रोपनी कर रहे हैं। हालांकि, बिजली की आंख-मिचौनी और महंगे डीजल के कारण कृत्रिम रूप से सिंचाई करना हर किसान के बस की बात नहीं रह गई है, जिससे खेती की लागत दोगुनी हो चुकी है। खेती की इस बदहाली और सूखे की स्थिति पर जगदीशपुर के किसान राजकुमार पंजियारा ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इस साल मानसून ने हमें पूरी तरह निराश किया है। हमारे पास सरकारी सिंचाई का कोई पुख्ता साधन नहीं है। जिनके पास निजी बोरिंग है, वे तो दिन-रात पैसे फूंककर किसी तरह खेत गीला कर रहे हैं, लेकिन हम जैसे छोटे किसान क्या करें? डीजल इतना महंगा है कि अगर पंप चलाकर जैसे-तैसे धान रोप भी दें, तो आगे फसल बचाने के लिए पानी कहाँ से लाएंगे?
बिना बारिश के खेती करना घाटे का सौदा साबित हो रहा है। अगर जल्द ही अच्छी बारिश नहीं हुई, तो हमारी पूरी मेहनत और पूंजी डूब जाएगी और हमारे सामने भुखमरी की नौबत आ जाएगी। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अगले कुछ दिनों के भीतर भागलपुर और इसके आस-पास के प्रखंडों में मूसलाधार बारिश नहीं होती है, तो धान के कुल उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। समय पर रोपनी न होने से फसल की गुणवत्ता भी प्रभावित होगी। खेतों के खाली रह जाने और काम न मिलने के कारण ग्रामीण इलाकों से कृषक मजदूरों का पलायन भी तेजी से बढ़ सकता है। अब किसानों की एकमात्र उम्मीद केवल सरकार द्वारा मिलने वाले डीजल अनुदान, वैकल्पिक आकस्मिक फसल योजनाओं और इंद्र देव की दया पर टिकी हुई है।
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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर