निगलती गंगा, उजड़ते आशियाने; राघोपुर में पलायन की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी
भागलपुर, 04 सितंबर (हि.स.)। जिले के राघोपुर क्षेत्र में गंगा नदी का भीषण कटाव अब सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि इस दशक की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी और विस्थापन का संकट बन चुका है।
नदी की उग्र लहरें और तेज धार हर पल उपजाऊ जमीन और इंसानी बस्तियों को लील रही हैं। स्थिति यह है कि बहत्तरा, नन्हकार, छोटी अलालपुर और शंकरपुर जैसे गांवों का भूगोल बदलने की कगार पर है।
इन गांवों के सैकड़ों परिवारों के सिर से छत छिन चुकी है और हजारों लोग अपनी ही सरजमीं पर शरणार्थी बनने को मजबूर हो गए हैं। इस विस्थापन का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि पीड़ितों को संभलने का मौका तक नहीं मिल रहा है। जो घर सालों की मेहनत और गाढ़े पसीने की कमाई से बने थे, लोग आज उन्हें अपने ही हाथों से तोड़ने को मजबूर हैं।
राघोपुर के गांवों में हर तरफ चीख-पुकार और अफरातफरी का माहौल है। कोई रोते हुए अपने घर की छतों से खपड़े और टिन की चादरें उतार रहा है, तो कोई दीवारों से चौखट-किवाड़ उखाड़ रहा है। दिन हो या रात, लोग चैन की एक सांस नहीं ले पा रहे हैं। ट्रैक्टरों, बैलगाड़ियों और जो भी साधन मिल रहा है, उस पर अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी, बर्तन, कपड़े और अनाज लादकर लोग किसी सुरक्षित ठिकाने की तलाश में अंतहीन सफर पर निकल पड़े हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि कटाव घरों के मुहाने तक आ गया है; यदि पल भर की भी देरी हुई, तो सामान के साथ-साथ जिंदगी भी नदी में समा जाएगी। इस भीषण विस्थापन के बाद भी बाढ़ और कटाव पीड़ितों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। बेघर हुए गरीब परिवारों के पास सिर छुपाने की कोई जगह नहीं है। जब वे बेबसी में सड़क के किनारे तिरपाल तानकर या अपना सामान रखकर अपनी जान बचा रहे हैं, तो वहां भी उन्हें राहत की जगह प्रताड़ना मिल रही है।
पीड़ितों का आरोप है कि स्थानीय प्रशासन उनकी सुध लेने और पुनर्वास की व्यवस्था करने के बजाय, सड़क किनारे से भी सामान हटाने का दबाव बना रहा है। बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के इस तरह का प्रशासनिक रुख विस्थापितों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है।
राघोपुर क्षेत्र की एक बड़ी आबादी खेती और पशुपालन पर निर्भर है। इस महा-विस्थापन में पशुपालकों के सामने मवेशियों को बचाने का सबसे गंभीर संकट खड़ा हो गया है। खुद के रहने का ठिकाना नहीं है, ऐसे में इन बेजुबान जानवरों को कहां ले जाएं, इन्हें बाढ़ की धार से कैसे बचाएं और इनके चारे का इंतजाम कहां से करें—यह सवाल हर पशुपालक को खाए जा रहा है।
कई लोग औने-पौने दाम पर अपने मवेशी बेचने को मजबूर हैं, जो उनकी आजीविका का एकमात्र सहारा थे। उल्लेखनीय है कि इस तबाही ने न सिर्फ लोगों के घर छीने हैं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को भी गहरा जख्म दिया है। शंकरपुर का करीब 100 साल पुराना ऐतिहासिक चैती दुर्गा मंदिर देखते ही देखते गंगा की तेज धार में विलीन हो गया। दशकों पुराने इस सामाजिक और धार्मिक धरोहर के जमींदोज होने से ग्रामीणों की आत्मा कांप उठी है। बुजुर्गों की आंखें नम हैं और युवाओं में व्यवस्था के खिलाफ भारी आक्रोश है।
मंदिर का जाना ग्रामीणों के लिए एक युग के अंत जैसा है, जिसने उनके हौसले को पूरी तरह तोड़ दिया है। बाढ़ और कटाव के इस दोहरे दंश ने पूरे राघोपुर इलाके को दहशत के साए में धकेल दिया है। लोग डर के मारे सो नहीं पा रहे हैं कि न जाने कब रात में नदी उनके पैर तले की जमीन खींच ले। प्रशासनिक उपेक्षा, भूख, और आशियाना छिनने के बाद अब इन अभागे लोगों के पास इस इलाके से हमेशा के लिए पलायन करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है।
राघोपुर की धरती से उठ रहा यह विस्थापन का दर्द अब सरकार और प्रशासन से त्वरित पुनर्वास और ठोस नीति की गुहार लगा रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर