गंगा की पुकार, आस्था से आगे, अब जिम्मेदारी का समय
भागलपुर, 10 अप्रैल (हि.स.)। कहलगांव की पावन धरती, जहां गंगा उत्तरवाहिनी होकर बहती है, केवल एक धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं बल्कि सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां की पहचान गंगा की निर्मल धारा, डॉल्फिन सेंचुरी, तीन पहाड़ियों की मनोहारी छटा और बाबा बटेश्वर नाथ महादेव जैसे आध्यात्मिक स्थलों से जुड़ी हुई है।
पूर्व विधायक पवन कुमार यादव के आवास पर शुक्रवार को आयोजित बैठक में गंगा की अविरलता और निर्मलता को लेकर जो चिंता व्यक्त की गई, वह केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय चेतना का विषय है। गंगा में शहर के नालों का गिरता गंदा पानी न केवल इसकी पवित्रता को प्रभावित कर रहा है, बल्कि जैव विविधता—विशेषकर गंगा डॉल्फिन—के अस्तित्व के लिए भी खतरा बनता जा रहा है।
यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि कहलगांव से बटेश्वर स्थान तक गंगा का उत्तरवाहिनी प्रवाह एक अद्वितीय भौगोलिक विशेषता है, जिसका देश में दूसरा उदाहरण दुर्लभ है। इसके बावजूद यह क्षेत्र आज भी पर्यटन विकास की दृष्टि से अपेक्षित पहचान नहीं पा सका है। दूसरी ओर, विक्रमशिला महाविहार जैसे ऐतिहासिक धरोहर, जो कभी नालंदा के समकालीन शिक्षा केंद्र रहे, आज उपेक्षा का शिकार हैं। यदि नालंदा विश्वविद्यालय का पुनरुत्थान संभव है, तो विक्रमशिला और बटेश्वर नाथ धाम को भी बौद्ध और रामायण सर्किट से जोड़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित किया जा सकता है।
गंगा दशहरा के अवसर पर कहलगांव के उत्तरवाहिनी गंगा घाट पर जन जागरूकता अभियान, गंगा सफाई और महाआरती का निर्णय लिया गया ताकि एक सकारात्मक संदेश पूरे देश को जाय लेकिन यह प्रयास तभी सफल होगा जब इसमें आम जनता की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित हो। गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की जीवनरेखा है। इसे स्वच्छ और अविरल बनाए रखना सरकार, समाज और प्रत्येक नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है। अब समय आ गया है कि हम केवल आस्था तक सीमित न रहकर अपने कर्तव्यों को भी समझें और गंगा के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाएं।
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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर