सिल्क सिटी में थमा 'सिंगल स्क्रीन' का दौर, इतिहास के पन्नों में सिमटा भागलपुर का सिनेमाई गौरव
भागलपुर, 04 अगस्त (हि.स.)। सिल्क सिटी के नाम से मशहूर भागलपुर के सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने का एक बड़ा हिस्सा रहा 'सिंगल स्क्रीन सिनेमा' का गौरवशाली इतिहास अब पूरी तरह इतिहास बन चुका है। 30 जून 2025 की रात 8:15 बजे जब शहर के आखिरी सिंगल स्क्रीन थिएटर 'दीपप्रभा टॉकीज' का आखिरी शो खत्म हुआ, तो उसके साथ ही भागलपुर में पारंपरिक सिनेमाई युग का हमेशा के लिए अंत हो गया। जिले में कभी एक साथ 14 से 15 सिनेमा हॉल गूंजते थे, लेकिन आज उनकी जगह आधुनिक मल्टीप्लेक्स और खाली पड़े मलबों ने ले ली है। भागलपुर में सिनेमाई मनोरंजन की शुरुआत साल 1949 में 'मधु लक्ष्मी सिनेमा हॉल' से हुई थी, जो बाद में खलीफाबाग चौक पर 'पिक्चर पैलेस' के नाम से जाना गया। इसके बाद शहर और आसपास के इलाकों में सिनेमा का ऐसा क्रेज बढ़ा कि एक के बाद एक कई प्रसिद्ध सिनेमा हॉल खुले। इनमें प्रमुख सिनेमा हॉल में अजंता टॉकीज, शारदा टॉकीज, महादेव टॉकीज, शंकर टॉकीज, प्रेम चित्र मंदिर और जवाहर टॉकीज शामिल थे। वहीं सबौर में कल्पना टॉकीज, कहलगांव का नवचित्र मंदिर, सविता टॉकीज, सुलतानगंज और नवगछिया के कृष्णा, दुर्गा और मोहन चित्र मंदिर थे। वर्ष 1991 में खुला आदमपुर का दीपप्रभा टॉकीज लगभग 34 वर्षों तक शहर के मनोरंजन का सबसे बड़ा केंद्र बना रहा, जहाँ सलमान खान की 'हम आपके हैं कौन' 20 हफ्तों तक चलने का रिकॉर्ड बना चुकी थी। वर्तमान में, शहर के सभी पुराने सिंगल स्क्रीन हॉल बंद या ध्वस्त किए जा चुके हैं। दीपप्रभा टॉकीज की इमारत को भी जमींदोज कर दिया गया है। आज की तारीख में भागलपुर का सिनेमाई बाजार पूरी तरह से बदल चुका है। डीएन सिंह रोड पर स्थित इस आधुनिक मल्टीप्लेक्स में लोग प्रीमियम रिक्लाइनर, डॉल्बी 7.1 साउंड और डिजिटल टिकटिंग का आनंद ले रहे हैं। वहीं एफएम मॉल एंड सिनेमा (बरारी) यहाँ 6 स्क्रीन वाला अत्याधुनिक मल्टीप्लेक्स संचालित है। विशेषज्ञों और सिनेमा संचालकों के अनुसार, सिंगल स्क्रीन थिएटर्स के बंद होने के पीछे कई तकनीकी और आर्थिक कारण रहे हैं। ओटीटी और स्मार्टफोन की क्रांति: नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम और जियो सिनेमा जैसे प्लेटफॉर्म्स के आने से दर्शक घर बैठे ही नई फिल्में देखने लगे, जिससे सिनेमाघरों में दर्शकों की संख्या तेजी से घटी। आधुनिक दर्शक अब एयर-कंडीशंड एंबियंस, आरामदायक रिक्लाइनर कुर्सियों और बेहतर साउंड-पिक्चर क्वालिटी की मांग करते हैं, जिसे पुराने हॉल अपग्रेड नहीं कर पाए। उल्लेखनीय है कि सिंगल स्क्रीन हॉल का सिटिंग एरिया बड़ा (700-1000 सीटें) होता था। कम दर्शक आने पर भी बिजली, स्टाफ की सैलरी और सरकारी टैक्स का बोझ उठाना घाटे का सौदा साबित होने लगा। अब फिल्में केवल भारी-भरकम बजट और मल्टीप्लेक्स के हिसाब से रिलीज होती हैं, जिससे सिंगल स्क्रीन मालिकों को फिल्में मिलने में दिक्कतें आनी शुरू हो गईं। पुराने सिनेमा हॉलों के बंद होने से भागलपुर के आम नागरिकों, कला प्रेमियों और बुजुर्गों में गहरा दुख और पुरानी यादों का माहौल है। शहर के एक वरिष्ठ कला प्रेमी और रंगकर्मी डॉ जयंत जलद ने बताया कि सिनेमा हॉल हमारे लिए केवल फिल्म देखने की जगह नहीं थे, वे एक सामाजिक उत्सव हुआ करते थे। संडे को परिवार के साथ जाना, काउंटर पर धक्का खाकर टिकट लेना और हॉल में सीटों पर बजी तालियों और सीटियों की गूंज एक अलग ही दुनिया थी। आज मल्टीप्लेक्स में वो सामूहिक अपनापन गायब है, वहाँ सिर्फ व्यावसायिकता है। वहीं, युवाओं का कहना है कि मल्टीप्लेक्स में सुविधाएं तो बेहतरीन हैं, लेकिन टिकट और खाने-पीने की चीजें इतनी महंगी हैं कि वह आम और गरीब तबके की पहुंच से बाहर हो चुकी हैं। सिंगल स्क्रीन सिनेमा हर वर्ग को आपस में जोड़ता था, जिसका बंद होना सिल्क सिटी के सांस्कृतिक इतिहास की एक अपूरणीय क्षति है।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर