सारण में ऋतुओं एवं त्योहारों के संग बदलता बाजार
सारण, 26 अगस्त (हि.स.)।
जिले की संस्कृति और परंपराओं की सबसे खूबसूरत झलक यहाँ के बाज़ारों में देखने को मिलती है। जैसे-जैसे ऋतुएँ बदलती हैं, त्योहारों का आगमन होता है और उसी के साथ यहाँ के बाज़ारों का रंग-रूप भी पूरी तरह बदल जाता है। बाजार का यह बदलता दृश्य न केवल यहाँ की आर्थिक गतिविधियों को गति देता है, बल्कि लोक आस्था और जन-जीवन के गहरे जुड़ाव को भी उजागर करता है।
सावन का महीना आते ही पूरा सारण केशरिया रंग में रंग जाता है। मुख्य बाज़ारों से लेकर गलियों की दुकानों तक, भगवान भोलेनाथ के पूजन सामग्रियाँ, बेलपत्र, भांग और केसरिया वस्त्र छा जाते हैं। इसके तुरंत बाद राष्ट्रीय पर्व स्वतंत्रता दिवस पर देशभक्ति का माहौल बनता है, जहाँ हर दुकान तिरंगे की विविध कलाकृतियों, झंडों और सजावटी सामानों से सज उठती है।
तारीखों के आगे बढ़ते ही भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक राखी का त्योहार आता है। बाज़ारों में सजी रंग-बिरंगी राखियों की दुकानें और मिठाइयों की महक हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती है। माह बदलते ही जन्माष्टमी के अवसर पर दुकानों में बाल-गोपाल के सुंदर वस्त्र, मुकुट, बांसुरी और श्रृंगार के सामानों की भरमार दिखती है, वहीं शारदीय नवरात्रि और दशहरा में माँ दुर्गा के पूजन-सामान से बाज़ार गुलज़ार रहते हैं।
वर्ष का सबसे बड़ा व्यापारिक समय धनतेरस और दीपावली पर देखने को मिलता है, जब बाज़ार जगमगा उठते हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण, नए बर्तन, रंग-बिरंगे दीये, झालरें और सजावटी सामानों की भारी बिक्री होती है। इसके बाद आता है उत्तर भारत और बिहार का सबसे पवित्र लोक आस्था का महापर्व छठ। इस दौरान सारण का ऐसा कोई कोना या दुकान नहीं होती जहाँ छठ व्रत से जुड़ी सामग्रियाँ न मिल रही हों। सूप, दउरा, फल, ठेकुआ सामग्री और गन्ने से पूरा शहर पटा रहता है।
सारण का बाज़ार केवल वस्तुओं के क्रय-विक्रय का केंद्र नहीं है, बल्कि यह यहाँ के बदलते मौसम, उमंग और हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक सजग दर्पण है।
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हिन्दुस्थान समाचार / धनंजय कुमार