राष्ट्रपति का अपमान, देश का अपमान: प्रेम रंजन पटेल

 

पटना, 08 मार्च (हि.स.)। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के द्वारा देश की संवैधानिक संस्थाओं और् गरिमा के प्रति जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग और व्यवहार किया गया, वह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है। उक्त बातें भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता तथा पूर्व विधायक प्रेम रंजन पटेल ने कहीं।

उन्होंने कहा कि भारत का संविधान देश की सर्वोच्च व्यवस्था है और उसके सर्वोच्च पद पर विराजमान महामहिम राष्ट्रपति का सम्मान करना प्रत्येक राज्य सरकारों, जनप्रतिनिधि और नागरिक का कर्तव्य है। ऐसे में राष्ट्रपति पद की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला कोई भी वक्तव्य पूरे देश की संवैधानिक भावना को आहत करता है।

उन्होंने कहा कि देश की महामहिम राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू न केवल देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन हैं, बल्कि वह आदिवासी समाज से आने वाली पहली महिला राष्ट्रपति हैं। यह पूरे देश के लिए गर्व और सम्मान का विषय है। ऐसे महान पद पर आसीन महिला के प्रति असम्मानजनक टिप्पणी करना केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि देश के संविधान, लोकतांत्रिक परंपराओं और आदिवासी समाज का भी अपमान है।

भारत का लोकतंत्र मर्यादा, संवाद और संस्थाओं के सम्मान पर आधारित है। यदि कोई भी नेता राजनीतिक द्वेष या तुष्टिकरण की राजनीति के कारण इन मर्यादाओं को तोड़ने का प्रयास करता है तो देश की जनता उसे स्वीकार नहीं करती। पश्चिम बंगाल की जनता भी सब कुछ देख और समझ रही है।

प्रेम रंजन पटेल ने कहा कि पश्चिम बंगाल में लंबे समय से राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार, घोटालों और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की घटनाओं से आम लोगों में आक्रोश है। जब देश की सर्वोच्च संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुँचाने की कोशिश की जा रही है तो यह स्पष्ट है कि ममता सरकार सत्ता के अहंकार में लोकतांत्रिक मूल्यों को भी अनदेखी कर रही है।

उन्होंने कहा कि बंगाल की जनता अब परिवर्तन का मन बना चुकी है। राज्य में सुशासन, पारदर्शिता और विकास की नई उम्मीद के साथ परिवर्तन की आंधी बह रही है। जनता लोकतंत्र का अपमान और संवैधानिक पदों की अवमानना करने वाली राजनीति को अब बर्दाश्त नहीं करेगी। होने वाले चुनाव में पश्चिम बंगाल की जनता लोकतंत्र और संविधान के सम्मान के पक्ष में अपना फैसला सुनाएगी। यह चुनाव केवल सरकार बदलने का नहीं बल्कि राज्य में लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक मर्यादाओं की पुनर्स्थापना का चुनाव होगा।

पश्चिम बंगाल में परिवर्तन की जो लहर उठ चुकी है, वह स्पष्ट संकेत दे रही है कि सत्ता का अहंकार ज्यादा दिनों तक नहीं टिकेगा। जनता अपने मताधिकार की ताकत से जवाब देगी और राज्य में एक नई राजनीतिक दिशा तय करेगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुरभित दत्त