भागलपुर में प्याज और चीनी एक ही ‘शाही सिंहासन’ पर विराजमान, ठेले वालों ने सलाद से प्याज को दिया ‘देश निकाला’

 




भागलपुर, 02 सितंबर (हि.स.)। महंगाई के इस ‘स्वर्ण युग’ में आखिरकार वह समाजवाद आ ही गया है, जिसकी कल्पना बड़े-बड़े विचारकों ने की थी। अब अमीर हो या गरीब, तीखा हो या मीठा, सब एक बराबर हो चुके हैं। सिल्क सिटी भागलपुर के कोने-कोने में इन दिनों सबसे कीमती वस्तु तिजोरियों में नहीं, बल्कि आपकी रसोई के कोने में रखी चीनी और टोकरी में पड़ा प्याज बन चुका है। भागलपुर शहर के ऐतिहासिक गिरधारी साह हाट से लेकर तंग गलियों तक, चीनी और प्याज दोनों 70 रुपया प्रति किलो के शाही सिंहासन पर एक साथ विराजमान हैं। ग्रामीण इलाकों में तो इनके तेवर और भी कड़े हैं, हालांकि कहीं-कहीं प्याज थोड़े नरम तेवर के साथ 65 रुपया प्रति किलो भी बिक रहा है। लेकिन इस कड़वे सच ने आम जनता के बजट का स्वाद पूरी तरह बिगाड़ दिया है। इस अप्रत्याशित मूल्य वृद्धि ने भागलपुर की गृहिणियों के सामने एक नया ‘यक्ष प्रश्न’ खड़ा कर दिया है। महिलाएं परेशान हैं कि जब दोनों का भाव एक ही है, तो सुबह की चाय में चीनी डालें या दोपहर की सब्जी में प्याज का तड़का लगाएं! अब अपनों को चाय पर बुलाना भी किसी बड़े वित्तीय जोखिम से कम नहीं लग रहा है। बाजार का आलम यह है कि आम जनता अब हाथ में ‘रुपया’ नहीं, बल्कि अपना कलेजा लेकर निकल रही है। गली-मोहल्ले के किराना दुकानदार ग्राहकों को चीनी और प्याज ऐसे तौलकर दे रहे हैं, मानो किसी प्रतिष्ठित आभूषण की दुकान में 24 कैरेट सोने की नाप-जोख हो रही हो। थोक मंडी के कारोबारी दबी जुबान में ‘आवक कम’ होने का रोना रो रहे हैं, जबकि आम जनता का मानना है कि इस महंगाई में उनकी जेब में अब सांसें ही कम बची हैं। भागलपुर में रहकर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों का बजट इस कदर डगमगा गया है कि उन्होंने नया तरीका ढूंढ निकाला है। छात्र अब किताबों के पन्नों के बीच महंगे प्याज के छिलके बतौर ‘एंटीक पीस’ सहेजकर रख रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियों को बता सकें कि एक दौर ऐसा भी था जब वे प्याज खाया करते थे। महंगाई के इस तांडव का सबसे पहला शिकार बेचारा सलाद और नॉनवेज बना है। सावन का महीना होता तो प्याज को ‘किचन से तड़ीपार’ करना आसान था, लेकिन अब भादो मास आ चुका है। एक महीने तक वेज खाने के बाद अब नॉनवेज से इश्क का सिलसिला शुरू ही हुआ था कि प्याज की ‘रंगदारी’ ने रंग में भंग डाल दिया है। शहर के बड़े-बड़े रेस्टोरेंट अब प्लेट में प्याज के दो-चार छल्ले ऐसे परोस रहे हैं, जैसे किसी को वीआईपी सुरक्षा कवर दे रहे हों। वहीं, सड़क किनारे ठेले और मेस चलाने वालों ने तो ऐतिहासिक फैसला लेते हुए अपने सलाद की प्लेट से प्याज को हमेशा-हमेशा के लिए ‘देश निकाला’ दे दिया है। अब प्लेट में सिर्फ मूली और खीरा देखकर जब ग्राहक आंखें तरेरते हैं, तो दुकानदार बेहद दार्शनिक अंदाज में जवाब देते हैं भैया, सेहत के लिए प्याज अच्छा नहीं होता, दिल का दौरा पड़ सकता है... खासकर तब, जब आप उसका बिल देखेंगे! फिलहाल, भागलपुर की जनता तीखे प्याज और मीठी चीनी के इस अनोखे ‘गठबंधन’ से त्रस्त है और राहत की उम्मीद में टकटकी लगाए बैठी है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर