युवाओं की ऊर्जा को संघनित कर परिवर्तनगामी बनाना कार्यशाला का उद्देश्य: उदय

 


भागलपुर, 13 सितंबर (हि.स.)। भागलपुर के कला केंद्र में रविवार को 'परिधि' संस्था द्वारा युवा नेतृत्व एवं दृष्टि निर्माण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में कहलगांव, मक्खातकिया, नवगछिया और भागलपुर शहरी क्षेत्र के लगभग 40 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें से अधिकांश मछुआ समाज से थे।

कार्यशाला के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए परिधि के निदेशक उदय ने कहा कि युवाओं की ऊर्जा को संघनित कर परिवर्तनगामी बनाना इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य है। इस प्रक्रिया के तहत लगातार नियमित प्रशिक्षण आयोजित किए जा रहे हैं।

उन्होंने समाज में प्रचलित विभिन्न शब्दावलियों जैसे समाजवाद, पूंजीवाद, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और रूढ़िवाद आदि विषयों पर विस्तार से समूह चर्चा का संचालन किया। मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित गांधी विचार विभाग के प्राध्यापक डॉ. उमेश नीरज ने 'विशेष अवसर' की अवधारणा और इसके लिए संविधान सभा में हुई बहस की विस्तृत चर्चा की।

उन्होंने संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों का जिक्र करते हुए बताया कि हमारे संविधान ने सभी को बराबर अवसर प्रदान करने हेतु कई बार अपने संकल्पों को दोहराया है। डॉ. नीरज ने महात्मा फुले और सावित्रीबाई फुले द्वारा वर्ष 1848 में लड़कियों के लिए स्थापित पहले विद्यालय का उल्लेख करते हुए कहा कि महात्मा गांधी, डॉ. आंबेडकर के पूना पैक्ट से पहले भी कई समाज सुधारकों ने सामाजिक एकता, सम्मान, छुआछूत, जात-पात और धार्मिक अंधविश्वास के खिलाफ आंदोलन चलाए। इन्हीं आंदोलनों का असर था कि संविधान में सामाजिक एकता, बराबरी और मानवीय गरिमा के लिए कानूनी प्रावधान किए गए। लिंग भेद पर चर्चा करते हुए वक्ताओं ने कहा कि भारतीय उपमहाद्वीप की सामाजिक व्यवस्था पितृसत्तात्मक है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 के तहत पुत्र और पुत्री दोनों को पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार मिलने के बावजूद समाज आज भी बेटियों को उनका हक देने को तैयार नहीं है। वक्ताओं ने उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि किसी व्यक्ति का दायां हाथ मजबूत और बायां हाथ कमजोर हो, तो उसे मजबूत नहीं बल्कि विकलांग कहा जाएगा। ठीक इसी प्रकार, जिस समाज में महिलाएं दोयम दर्जे की होती हैं, वह समाज भी विकलांग हो जाता है। युवा वर्ग ही इस भेदभाव की खाई को पाट सकता है। कार्यक्रम में प्रतिभागी राहुल ने धर्मनिरपेक्षता को भारत की आत्मा बताते हुए कहा कि संविधान में शामिल होने से पूर्व से ही भारत के लोग इसे अपने व्यवहार में अमल में ला रहे हैं। एक ही परिवार में खान-पान और अलग-अलग देवी-देवताओं की मान्यताओं के बावजूद सब एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, यही विविधता में एकता और धर्मनिरपेक्षता है। उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से संस्कृति और धार्मिक स्वतंत्रता के अंतर को भी स्पष्ट किया। कार्यशाला का निष्कर्ष साझा करते हुए कहा गया कि युवाओं में नेतृत्व का विकास तभी संभव है जब वे समाज, धर्म, राष्ट्रीय एकता, मानवीय गरिमा और बराबरी की बात को गहराई से समझेंगे। सबको साथ लेकर आगे बढ़ना ही नेतृत्व का सच्चा अर्थ है। इस अवसर पर योगेंद्र साहनी, विनय कुमार भारती, सुषमा, स्मिता कुमारी और रोहित कुमार सिंह सहित अनेक वक्ताओं और युवाओं ने अपने विचार साझा किए।

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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर