सम्राट मंत्रिमंडल में ईं शैलेंद्र और बुलो मंडल को मिली जगह, बढ़ा गंगा पार का राजनीतिक वजन

 




भागलपुर, 07 मई (हि.स.)। लगभग 13 साल बाद भागलपुर जिले के दो विधायक भाजपा से बिहपुर विधायक इंजीनियर कुमार शैलेंद्र और जदयू से गोपालपुर विधायक शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल को बिहार सरकार में मजबूत राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला है।

फर्क सिर्फ इतना नहीं है कि जिले से मंत्री बनाए गए हैं, बल्कि इस बार एक साथ दो नेताओं को कैबिनेट में जगह मिली है। दोनों नेता नवगछिया इलाके और गंगा पार की राजनीति से आते हैं। यानी बिहार की सत्ता में इस बार गंगा पार का राजनीतिक वजन अचानक बढ़ गया है।

इससे पहले भागलपुर जिले से आखिरी बड़ा प्रतिनिधित्व तब दिखा था जब भागलपुर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के अश्विनी चौबे मंत्री बने थे। भागलपुर जिले की राजनीति लंबे समय तक शहर केंद्रित रही। लेकिन इस बार सत्ता का फोकस नवगछिया और गंगा पार के इलाकों की ओर शिफ्ट होता दिख रहा है।

दरअसल, नवगछिया बेल्ट सामाजिक समीकरण, जातीय प्रभाव और सीमांचल से जुड़ाव की वजह से हमेशा राजनीतिक रूप से संवेदनशील मानी जाती रही है। यहां का वोट पैटर्न बिहार की बड़ी राजनीति को प्रभावित करता है। ऐसे में भाजपा और जदयू दोनों ने इस इलाके को साधने की कोशिश की है। दोनों दलों ने ऐसे चेहरों को मंत्री बनाया है, जिनकी पहचान सिर्फ विधायक भर की नहीं, बल्कि अपने-अपने इलाकों में मजबूत संगठनात्मक पकड़ वाले नेताओं की रही है।

बिहपुर से तीन बार विधायक रह चुके इंजीनियर कुमार शैलेंद्र को भाजपा ने पहली बार मंत्री बनाकर साफ संकेत दिया है कि पार्टी अब भागलपुर और सीमांचल इलाके में अपने आक्रामक राजनीतिक नैरेटिव को और मजबूत करना चाहती है। कुमार शैलेंद्र की पहचान सिर्फ संगठन के नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक मुखर और विवादित बयान देने वाले नेता के रूप में भी रही है।

सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता और हिंदुत्व आधारित राजनीतिक भाषा ने उन्हें भाजपा के कोर समर्थकों के बीच लोकप्रिय बनाया। वर्ष 2025 में उनका वह बयान काफी चर्चा में रहा जिसमें उन्होंने राजद को मुसलमानों की पार्टी बताते हुए हमला बोला था। इस बयान ने राजनीतिक विवाद जरूर खड़ा किया, लेकिन भाजपा के एक वर्ग के बीच उनकी पहचान और मजबूत हुई। कुमार शैलेंद्र की सबसे बड़ी ताकत उनकी क्षेत्रीय पकड़ मानी जाती है।

बिहपुर सीट पर उनकी लगातार वापसी यह साबित करती है कि स्थानीय स्तर पर उनका मजबूत कैडर और व्यक्तिगत प्रभाव मौजूद है। वहीं लालू के करीबी से नीतीश के भरोसेमंद तक दूसरी तरफ जदयू ने शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल को मंत्री बनाकर राजनीतिक तौर पर बेहद रणनीतिक फैसला लिया है। वे पांच बार विधायक और एक बार सांसद रह चुके हैं। बिहपुर से उनकी राजनीति शुरू हुई और 2014 में उन्होंने भागलपुर लोकसभा सीट से भाजपा के बड़े मुस्लिम चेहरे शाहनवाज हुसैन को हराकर बड़ी राजनीतिक पहचान बनाई।

हालांकि 2019 में हार के बाद उनका राजनीतिक भविष्य कमजोर माना जा रहा था, लेकिन जदयू में आने के बाद उन्होंने फिर वापसी की। बड़ा राजनीतिक मोड़ तब आया जब 2025 विधानसभा चुनाव में जदयू ने चर्चित और विवादित विधायक गोपाल मंडल का टिकट काटकर बुलो मंडल को गोपालपुर से उम्मीदवार बना दिया। यह सिर्फ टिकट बदलने का फैसला नहीं था, बल्कि जदयू के भीतर शक्ति संतुलन बदलने का संकेत था। मंत्री बनाकर जदयू ने साफ किया है कि पार्टी नवगछिया बेल्ट में गोपाल मंडल युग से आगे बढ़ चुकी है और बुलो मंडल को नए राजनीतिक चेहरे के रूप में स्थापित करना चाहती है। दोनों मंत्रियों के चयन को सिर्फ संयोग मानना राजनीतिक रूप से गलत होगा। इसके पीछे कई बड़े संकेत छिपे हैं। भाजपा और जदयू दोनों जानती हैं कि आने वाले समय में सीमांचल और पूर्वी बिहार की राजनीति बेहद अहम होने वाली है। ऐसे में गंगा पार के मजबूत नेताओं को सत्ता में हिस्सेदारी देना चुनावी निवेश माना जा रहा है।

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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर