मुंगेर स्थित पादुका दर्शन में लक्ष्मीनारायण यज्ञ का शुभारंभ, स्वामी निरंजनानंद ने बताया भक्ति का महत्व

 


-भक्ति से भावनाओं का संतुलन, अंतःकरण की शुद्धि : स्वामी निरंजनानंद

पटना, 08 सितंबर (हि.स.)। बिहार के मुंगेर स्थित पादुका दर्शन में मंगलवार को वैदिक मंत्रोच्चार, संकीर्तन और गुरु-स्मरण के साथ लक्ष्मीनारायण यज्ञ का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि यज्ञ भक्ति भावनाओं को संतुलित करने और अंतःकरण को शुद्ध करने का माध्यम है।

उन्होंने कहा कि यह दिन अत्यंत पावन है। दादा गुरु स्वामी शिवानंद सरस्वती के जन्मदिवस पर लक्ष्मीनारायण यज्ञ का शुभारंभ हो रहा है। यज्ञ की पूर्णाहुति परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के जन्मदिन पर होगी। इस तरह यज्ञ की साधना में गुरु परंपरा के दो महान आचार्यों का स्मरण जुड़ा हुआ है।

स्वामी निरंजनानंद ने स्वामी शिवानंद सरस्वती के जीवन के दो प्रमुख आधार प्रेम और सेवा को बताया। उन्होंने कहा कि स्वामी शिवानंद का प्रेम आसक्ति और अपेक्षा से मुक्त था, जबकि उनकी सेवा निःस्वार्थ भाव पर आधारित थी। उनके जीवन का संदेश था कि आध्यात्मिक साधना केवल स्वयं तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि समाज और पीड़ित मानवता के प्रति संवेदना और सेवा से भी जुड़ी होनी चाहिए।

2011 से चली आ रही लक्ष्मीनारायण यज्ञ की परंपरा

उल्लेखनीय है कि पादुका दर्शन में लक्ष्मीनारायण यज्ञ की परंपरा वर्ष 2011 में शुरू हुई थी। तब से यह अनुष्ठान निरंतर आयोजित किया जा रहा है। इस वर्ष का आयोजन इस परंपरा का 16वां महायज्ञ है। संन्यास पीठ की आध्यात्मिक परंपरा में इस यज्ञ को आराध्य माता लक्ष्मी और भगवान नारायण की अहैतुकी अनुकंपा एवं कृपा का प्रतीक माना जाता है।

यज्ञ की भावना केवल भौतिक समृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन में शुभता, मांगल्य, शांति और आध्यात्मिक चेतना के विस्तार से भी जुड़ी है। यज्ञ की अग्नि में दी जाने वाली आहुति देवता के प्रति समर्पण और लोकमंगल की कामना का प्रतीक मानी जाती है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह अपने भीतर के विकारों को त्यागने का भी संकेत है।

काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से ऊपर उठकर प्रेम, सेवा, संयम और करुणा को जीवन में स्थान देना ही यज्ञ की अंतर्धारा को सार्थक करता है।

गुरु-स्मरण से पूर्णाहुति तक साधना की यात्रा

स्वामी शिवानंद सरस्वती के जन्मदिवस पर यज्ञ का शुभारंभ और परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के जन्मदिन पर इसकी पूर्णाहुति गुरु-परंपरा की निरंतरता का आध्यात्मिक संकेत है। यह परंपरा गुरु से शिष्य और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक साधना, सेवा और प्रेम के संदेश को आगे बढ़ाती है।------------

हिन्दुस्थान समाचार / गोविंद चौधरी