जेपी के संघर्ष और सम्पूर्ण क्रांति के संदेश को आत्मसात करने की जरूरत : संजय सरावगी
पटना, 08 अक्टूबर (हि.स.)। भारतीय जनता पार्टी, बिहार प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी चिंतक एवं ‘सम्पूर्ण क्रांति’ के प्रणेता, भारत रत्न लोकनायक जयप्रकाश नारायण की पुण्यतिथि पर पटना में आयोजित राजकीय समारोह में शामिल होकर उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर उन्होंने राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त) एवं मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साथ लोकनायक जयप्रकाश नारायण की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया।
संजय सरावगी ने कहा कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण का संपूर्ण जीवन राष्ट्र, लोकतंत्र और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के अधिकारों के लिए समर्पित रहा। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष तक उन्होंने अपने विचारों और सिद्धांतों से देश को नई दिशा देने का कार्य किया। उनका जीवन त्याग, संघर्ष, सादगी और जनसेवा का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि जयप्रकाश नारायण ने सत्ता को लक्ष्य नहीं, बल्कि जनसेवा को राजनीति का माध्यम माना। उन्होंने अन्याय, भ्रष्टाचार और निरंकुशता के खिलाफ आवाज उठाते हुए देश के युवाओं को लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी। ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का उनका आह्वान केवल राजनीतिक परिवर्तन तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और नैतिक परिवर्तन की व्यापक परिकल्पना थी।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि आज के समय में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हैं। लोकतंत्र की मजबूती, सामाजिक न्याय, पारदर्शिता और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। नई पीढ़ी को उनके संघर्ष, विचार और आदर्शों से परिचित कराने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि युवाओं को जेपी के जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि लोकनायक का जीवन देशवासियों को यह संदेश देता है कि जब लोकतांत्रिक मूल्यों और जन अधिकारों पर संकट आए, तब समाज के प्रत्येक वर्ग को सजग होकर अपनी भूमिका निभानी चाहिए। उनके विचार और आदर्श सदैव देश और समाज का मार्गदर्शन करते रहेंगे। लोकनायक जयप्रकाश नारायण की विरासत आने वाली पीढ़ियों को लोकतंत्र और राष्ट्रहित के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देती रहेगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुरभित दत्त