माहे रमजान के अंतिम दिन नन्हीं रोजेदार बेटियों ने रखा रोजा, बनीं प्रेरणाश्रोत

 


अररिया 20 मार्च(हि.स.)।माहे रमजान के मुकद्दस और बरकत भरे दिनों में छुआपट्टी वार्ड संख्या 16 से एक बेहद खूबसूरत और प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है। यहां की दो नन्हीं बच्चियों ने कम उम्र में रोज़ा रखकर न सिर्फ अपने परिवार, बल्कि पूरे मोहल्ले का दिल जीत लिया है। 7 वर्षीय मंतशा फरहत और 8 वर्षीय अलीज़ा फरहत ने अपनी मासूम आस्था, सब्र और इबादत के जज़्बे से यह साबित कर दिया कि नेक नीयत और मजबूत हौसले की कोई उम्र नहीं होती।

बताया जाता है कि दोनों बच्चियों ने खुद अपने माता-पिता से रोज़ा रखने की इच्छा जाहिर की। परिवार वालों ने उनकी छोटी उम्र को देखते हुए समझाने की कोशिश भी की, लेकिन मंतशा और अलीज़ा ने पूरे उत्साह, लगन और अनुशासन के साथ रोज़ा पूरा किया। बच्चियों के इस जज़्बे को देखकर परिवार के लोग भी भावुक हो उठे। घर का माहौल इबादत, दुआ और खुशी से भर गया।

मंतशा और अलीज़ा की माता सूफिया ने बताया कि बच्चियां शुरू से ही धार्मिक बातों में रुचि रखती हैं और रमजान के दिनों में नमाज़, दुआ और नेक कामों के प्रति विशेष उत्साह दिखाती हैं। उनके पिता फरहत शब्बीर, जो पेशे से पत्रकार हैं, ने कहा कि वे अपनी बेटियों को धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ अच्छे संस्कार, इंसानियत, अनुशासन और नैतिक मूल्यों की सीख देने का प्रयास करते हैं। यही वजह है कि कम उम्र में भी दोनों बच्चियों के भीतर इबादत के प्रति गहरा लगाव दिखाई देता है।

परिजनों के अनुसार, रोज़े के दौरान दोनों बच्चियों ने नमाज़ अदा की, कुरआनी तालीम पर ध्यान दिया और ज्यादा से ज्यादा अच्छे काम करने की कोशिश की। बच्चियों ने भी मासूमियत भरे अंदाज में कहा कि रमजान का महीना उन्हें बहुत प्रिय है और रोज़ा रखकर उन्हें बेहद खुशी मिलती है। उनकी बातों और आस्था ने मोहल्ले के लोगों को भी प्रभावित किया।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इतनी छोटी उम्र में रोज़ा रखना आसान नहीं होता, लेकिन मंतशा फरहत और अलीज़ा फरहत ने जिस धैर्य, संयम और श्रद्धा का परिचय दिया है, वह काबिले-तारीफ है। पूरे वार्ड में दोनों बच्चियों की चर्चा हो रही है और लोग उन्हें दुआओं से नवाज रहे हैं। हर कोई उनके उज्ज्वल भविष्य, अच्छी सेहत और कामयाबी की दुआ कर रहा है।

माहे रमजान के अंतिम दिनों में नन्हीं रोजेदार बेटियों की यह तस्वीर समाज को एक सकारात्मक और भावनात्मक संदेश देती है। यह बताती है कि बच्चों को यदि घर से अच्छे संस्कार, सही मार्गदर्शन और धार्मिक व नैतिक शिक्षा मिले, तो वे छोटी उम्र में भी बड़े आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / राहुल कुमार ठाकुर