सुपौल की ऐतिहासिक धरोहर ने खींचा देश का ध्यान, त्रिलोकधाम गोसपुर में मिलीं 600 वर्ष पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियाँ

 






सुपौल, 14 जून (हि.स.)। मिथिलांचल की प्राचीन ज्ञान परंपरा को नई पहचान दिलाने वाली एक महत्वपूर्ण खोज सामने आई है। राघोपुर प्रखंड के त्रिलोकधाम गोसपुर गांव में करीब 600 वर्ष पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियों के मिलने से इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और संस्कृत साहित्य के जानकारों में उत्साह का माहौल है।

बताया जा रहा है कि यहां 15वीं शताब्दी का काव्य-अलंकार ग्रंथ ‘कुवलयानंद’ तथा पूरे देश में उपलब्ध एकमात्र हस्तलिखित ‘भृगुसंहिता’ सुरक्षित अवस्था में मौजूद है। इन पांडुलिपियों की जानकारी मिलने के बाद जिलाधिकारी सावन कुमार और पुलिस अधीक्षक शरथ आर. एस. स्वयं गोसपुर पहुंचे और उनके संरक्षण एवं ऐतिहासिक महत्व का अवलोकन किया। निरीक्षण के दौरान संबंधित जानकारों से भी विस्तृत जानकारी प्राप्त की गई।

जानकारी के अनुसार ये प्राचीन दस्तावेज संस्कृत, हिंदी और मिथिलाक्षर लिपि में लिखे गए हैं। विद्वानों का मानना है कि यह खोज इस बात का महत्वपूर्ण प्रमाण है कि मिथिलांचल लंबे समय से ज्ञान, दर्शन, व्याकरण और न्यायशास्त्र जैसी विद्या परंपराओं का प्रमुख केंद्र रहा है। इन अमूल्य धरोहरों को सुरक्षित रखने का श्रेय दरभंगा महाराज के राजपंडित रहे त्रिलोकनाथ मिश्रा के परिवार को दिया जा रहा है। उनके पौत्र पंडित शचींद्रनाथ मिश्रा और प्रपौत्र आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्रा ने पीढ़ियों से इन दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण किया, जिससे यह अनमोल विरासत आज भी सुरक्षित बनी हुई है।

जानकारों का कहना है कि इस खोज से न केवल सुपौल, बल्कि पूरे बिहार की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी। वहीं संस्कृति मंत्रालय और बिहार सरकार के ज्ञान भारतम् मिशन के उद्देश्यों को मजबूती मिलने की बात भी कही जा रही है। स्थानीय विद्वानों और बुद्धिजीवियों ने इस दिशा में प्रशासन की सक्रियता की भी सराहना की है।

हिन्दुस्थान समाचार / विनय कुमार मिश्र