महाकाल मंदिर में मां कुष्मांडा की वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुई पूजा-अर्चना

 




किशनगंज, 14 अक्टूबर (हि.स.)। शारदीय नवरात्र के चौथे दिन बुधवार को शहर के रुईधासा स्थित महाकाल मंदिर में मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कुष्मांडा की पूजा-अर्चना वैदिक मंत्रोच्चार के साथ की गई। मंदिर के पुरोहित गुरु साकेत के सानिध्य में विधि-विधानपूर्वक पूजा संपन्न कराई जा रही है। माता के दर्शन और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला जारी रहा। नवरात्र को लेकर मंदिर परिसर में भक्तिमय माहौल बना हुआ है। वहीं, संध्या में भव्य आरती का आयोजन किया जाएगा। इसे लेकर मंदिर को आकर्षक ढंग से सजाया गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कुष्मांडा ने अपनी मंद मुस्कान से सृष्टि की रचना की थी। इसी कारण उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति और सृजन की देवी के रूप में पूजा जाता है। गुरु साकेत ने कहा कि जब चारों ओर अंधकार व्याप्त था, तब देवी की दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड में प्रकाश का संचार हुआ और सृष्टि की उत्पत्ति हुई। मां कुष्मांडा का स्वरूप ऊर्जा, प्रकाश, आशा और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। मां कुष्मांडा को अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। उनकी आठ भुजाओं में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र और गदा सहित विभिन्न दिव्य वस्तुएं सुशोभित रहती हैं। आठवें हाथ में वे जपमाला धारण करती हैं। देवी सिंह पर विराजमान रहती हैं। धार्मिक मान्यताओं में उनकी आराधना से आरोग्य, सुख-समृद्धि, ऊर्जा और सकारात्मकता प्राप्त होने की कामना की जाती है। नवरात्र के चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा में पीले रंग को विशेष महत्व दिया जाता है। भक्त माता को पीले पुष्प और प्रसाद अर्पित कर परिवार की सुख-शांति एवं समृद्धि की कामना करते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां की कृपा से जीवन में व्याप्त नकारात्मकता दूर होती है और नई ऊर्जा का संचार होता है। महाकाल मंदिर में पूजा-अर्चना और आरती को लेकर श्रद्धालुओं में खास उत्साह देखा जा रहा है। मंदिर परिसर में मां के जयकारों और भक्ति भाव से पूरा वातावरण आध्यात्मिक रंग में रंगा हुआ है। नवरात्र के आगामी दिनों में भी मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान जारी रहेंगे।

हिन्दुस्थान समाचार / धर्मेन्द्र सिंह