खतरे के साये में नौनिहाल: गंगा के कटाव ने छीना स्कूल, नेशनल हाईवे पर जान हथेली पर रखकर जाने को मजबूर बच्चे

 


भागलपुर, 29 अक्टूबर (हि.स.)। भागलपुर का एक ऐसा जख्म, जिसे आज क्षेत्र का हर जर्रा-जर्रा महसूस कर रहा है। माता-पिता की ख्वाहिश थी कि बच्चों का भविष्य मजबूत बने, लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि इन मासूमों के कदमों को एक सुरक्षित रास्ता तक नसीब नहीं है। जिन नन्हे हाथों में किताबें होनी चाहिए और जिन आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने, वही बच्चे आज हर कदम पर जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। यह दर्दनाक और भयावह तस्वीर भागलपुर के सबौर प्रखंड की मामलखा पंचायत के पुरानी रामनगर गांव की है। यहां गंगा का भीषण कटाव सिर्फ उपजाऊ जमीन और पक्के मकानों को ही नहीं निगल रहा, बल्कि नौनिहालों की शिक्षा और सुरक्षा पर भी गहरा संकट बनकर मंडरा रहा है।

गंगा की तेज लहरों ने गांव के कई आशियानों को जमींदोज कर अपने आगोश में ले लिया है। कटाव को रोकने के लिए सरकार की ओर से करोड़ों रुपये खर्च कर कटावरोधी कार्य भी कराए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात जस के तस बने हुए हैं। अब स्थिति यह हो चुकी है कि गांव का सरकारी विद्यालय भी कटाव के बिल्कुल मुहाने पर पहुंच गया है। बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए प्रशासन को स्कूल बंद करना पड़ा है। स्कूल बंद होने का सबसे बड़ा खामियाजा यहां के मासूम बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। गांव का स्कूल बंद होने के कारण बच्चों को अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए दूसरे गांव के स्कूल का रुख करना पड़ रहा है। बच्चे हर दिन कई किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हैं।

इस सफर के बीच में नेशनल हाईवे पड़ता है, जहां चौबीसों घंटे तेज रफ्तार गाड़ियां दौड़ती हैं। भारी वाहनों के बीच सड़क पार करते समय हर पल यह डर सताता है कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाए। छोटे-छोटे बच्चे सहमे हुए कदमों से किसी तरह हाईवे पार करते हैं और अपनी मंजिल की ओर बढ़ते हैं। मुसीबत सिर्फ हाईवे तक ही सीमित नहीं है। स्कूल से घर लौटते समय कटाव के कारण जर्जर हो चुका बांध और कच्चा रास्ता उनके लिए एक और बड़ा खतरा बन जाता है। फिसलन भरे और टूटे-फूटे रास्ते पर चलते समय बच्चों को हमेशा यह खौफ रहता है कि कहीं पैर फिसलने से वे सीधे उफनती नदी में न समा जाएं। शिक्षा की नींव मजबूत करने निकले इन नौनिहालों के लिए हर दिन का सफर किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

स्थानीय ग्रामीण वर्षों से क्षेत्र में एक मजबूत रिंग बांध और ठोस कटावरोधी उपायों की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। करोड़ों के फंड बह गए, पर जमीन पर सुरक्षा का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं दिख रहा है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक ये मासूम बच्चे डर के साये में स्कूल जाने को मजबूर रहेंगे? क्या जिला प्रशासन और जल संसाधन विभाग किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहे हैं, या इन नौनिहालों के सुरक्षित भविष्य के लिए समय रहते कोई ठोस कदम उठाया जाएगा? कल्याणी कुमारी, छात्रा का कहना है कि हमारा स्कूल गंगा में समाने वाला है, इसलिए बंद हो गया। अब हमें दूसरे गांव के स्कूल जाना पड़ता है।

हाईवे पार करते समय बहुत डर लगता है, गाड़ियां बहुत तेज आती हैं। छात्र शांतनु कुमार कहते हैं कि स्कूल जाने के रास्ते में जो बांध है, वह पूरी तरह टूट चुका है। वहां बहुत फिसलन रहती है। हमेशा डर लगा रहता है कि कहीं पैर फिसला तो हम सीधे नदी में गिर जाएंगे। ग्रामीण विपिन कुमार कहते हैं कि सरकार ने कटाव रोकने के नाम पर करोड़ों रुपये पानी में बहा दिए, लेकिन हमारा गांव आज भी उजड़ रहा है। अब तो बच्चों का स्कूल भी बंद हो गया और उनकी जान दांव पर लगी है। अगर जल्द ही मजबूत रिंग बांध नहीं बना, तो पूरा गांव नदी में विलीन हो जाएगा।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर