50 साल से खगड़ा स्टेडियम रोड पर सज रही आस्था और परंपरा की दुकान, तीन पीढ़ियों से सूप-दउरा बना रहे कारीगर
किशनगंज, 31 अक्टूबर (हि.स.)। लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा को लेकर शहर में भक्ति और उत्साह का माहौल है। बाजारों में पूजन सामग्री की खरीदारी तेज हो गई है।
इसी बीच खगड़ा स्टेडियम रोड पर परंपरा, मेहनत और पुश्तैनी हुनर की एक अनूठी तस्वीर देखने को मिल रही है। यहां पिछले करीब 50 वर्षों से बांस के सूप और दउरा बनाने की परंपरा लगातार जारी है।
खास बात यह है कि इस काम से जुड़े कारीगर तीन पीढ़ियों से इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। छठ महापर्व में भगवान भास्कर को अर्घ्य अर्पित करने के लिए बांस से बने सूप और दउरा का विशेष धार्मिक महत्व है।
इसी जरूरत को पूरा करने के लिए जिले के अंगर इलाके से हर साल सैकड़ों पारंपरिक कारीगर दशहरा समाप्त होते ही खगड़ा स्टेडियम रोड पहुंच जाते हैं। यहां सड़क किनारे अस्थायी झोपड़ियां और कार्यशालाएं बनाकर वे सूप-दउरा तैयार करने में जुट जाते हैं। पर्व समाप्त होने तक इनका पूरा परिवार इसी काम में लगा रहता है। कारीगरों के अनुसार, उनके दादा-परदादा भी वर्षों पहले इसी स्थान पर आकर छठ के लिए सूप और दउरा बनाया करते थे। उसी परंपरा को आज नई पीढ़ी भी आगे बढ़ा रही है।
बांस को बारीक पट्टियों में चीरना और फिर हाथों से उसकी बुनाई कर मजबूत सूप और दउरा तैयार करना आसान काम नहीं है। इसमें काफी मेहनत, धैर्य और हुनर की जरूरत होती है। एक कुशल कारीगर दिनभर की मेहनत के बाद औसतन 8 से 10 सूप और इतने ही दउरा तैयार कर पाता है। यहां तैयार होने वाले सूप और दउरा की आपूर्ति किशनगंज शहर के साथ जिले के विभिन्न इलाकों में की जाती है। कारीगरों की यह 50 साल पुरानी परंपरा केवल छठ महापर्व की धार्मिक आस्था से ही नहीं जुड़ी है, बल्कि सैकड़ों परिवारों की आजीविका का भी महत्वपूर्ण आधार है।
आधुनिकता के दौर में भी इन शिल्पकारों ने अपने पुश्तैनी हुनर को बचाकर रखा है। खगड़ा स्टेडियम रोड पर बांस की बुनाई से तैयार होते सूप-दउरा आज भी लोक संस्कृति, परंपरा और मेहनतकश हाथों की पहचान बने हुए हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / धर्मेन्द्र सिंह