सुधार गृह की व्यवस्था देख राज्य बाल संरक्षण आयोग के सदस्य ने भवन बदलने का दिया निर्देश
सारण, 29 मई (हि.स.)। बिहार राज्य बाल संरक्षण आयोग के सदस्य डॉ सुग्रीव कुमार शुक्रवार को सारण जिले के दौरे पर पहुंचे।
उन्होंने छपरा स्थित बाल सुधार गृह, कल्याण छात्रावास और गड़खा स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान बाल सुधार गृह की जर्जर स्थिति और क्षमता से अधिक बच्चों को रखे जाने पर उन्होंने गहरी नाराजगी व्यक्त की। प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए डॉ सुग्रीव कुमार ने बताया कि छपरा बाल सुधार गृह में बेड की क्षमता मात्र 36 है, जबकि वहां 50 बच्चों को रखा गया है।
उन्होंने कहा कम जगह होने के कारण बच्चों की शारीरिक गतिविधियां और स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। मैंने संबंधित अधिकारियों को अविलंब भवन बदलने और साफ-सफाई के साथ-साथ भोजन की गुणवत्ता में सुधार करने का सख्त निर्देश दिया है।
आयोग के सदस्य ने सुधार गृह में आवासित बच्चों से सीधा संवाद भी किया। उन्होंने बच्चों को मुख्यधारा से जुड़ने के लिए प्रेरित किया, जिस पर कई बच्चों ने अपनी गलतियां स्वीकार कर भविष्य में सुधार का संकल्प लिया। इसके पश्चात, कल्याण छात्रावास के निरीक्षण में उन्होंने जलजमाव की समस्या पर नाराजगी जताई और वहां पुस्तकालय को व्यवस्थित करने तथा बिजली के लिए जनरेटर या इन्वर्टर की व्यवस्था करने को कहा।
उन्होंने कस्तूरबा विद्यालय की व्यवस्थाओं का भी जायजा लिया और अधिकारियों को बच्चों के सर्वांगीण विकास हेतु टाइम-टेबल का कड़ाई से पालन कराने का निर्देश दिया। इस दौरान उन्होंने कहा की आधुनिकता की दौड़ में हम अपने बच्चों के भविष्य को किस ओर ले जा रहे हैं, यह एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। हाल ही में एक आयोग द्वारा जारी शोध रिपोर्ट ने समाज और अभिभावकों के होश उड़ा दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में लगभग 78.65% बच्चे रोजाना 6 से 7 घंटे मोबाइल फोन का उपयोग कर रहे हैं।
इस अत्यधिक उपयोग के परिणाम बेहद भयावह हैं। अध्ययन में पाया गया कि 40% बच्चे कर्ज के जाल में फंस रहे हैं, जबकि 20% बच्चे मोबाइल की लत के कारण अपनी वार्षिक परीक्षाओं में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। हजारों बच्चे मानसिक रूप से बीमार हो रहे हैं और अस्पतालों में ऐसे मामलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि यदि अभिभावकों ने बच्चों की इस आदत पर नियंत्रण नहीं पाया, तो अगले 15 वर्षों में हर घर में विकलांग बच्चे दिखाई देंगे। बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं। यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा मोबाइल छोड़े, तो आपको स्वयं उदाहरण पेश करना होगा। भोजन के समय बच्चों को दिखाते हुए खुद भोजन करें, न कि फोन देखें। उनके साथ सक्रिय रूप से खेलें। यदि आप चाहते हैं कि बच्चा पढ़े, तो आपको स्वयं हाथ में पुस्तक लेकर पढ़ने का नाटक या अभ्यास करना होगा। अंत में उन्होंने कहा की हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम अपनी भावी पीढ़ी को इस डिजिटल दलदल से बाहर निकालें, ताकि उनका बचपन और भविष्य सुरक्षित रह सके।
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हिन्दुस्थान समाचार / धनंजय कुमार