नवजात की परेशानी को आशा ने पहचाना, समय पर इलाज से बची जान

 


किशनगंज, 07 अक्टूबर (हि.स.)। जन्म के बाद नवजात की देखभाल में आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण साबित हो रही है। बेलवा बस्ती निवासी राजेश के नवजात ने जन्म के कुछ दिनों बाद दूध पीना कम कर दिया और सामान्य से अधिक सोने लगा। परिवार ने इसे कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर दिया। इसी दौरान नियमित गृह भ्रमण पर पहुंची आशा कार्यकर्ता जोहरा खातून ने बच्चे की स्थिति को सामान्य नहीं माना और परिवार को तत्काल स्वास्थ्य केंद्र ले जाने की सलाह दी। जांच के बाद आवश्यक उपचार व देखभाल मिलने से बच्चे की स्थिति में सुधार हुआ।

स्वास्थ्य विभाग के गृह आधारित नवजात देखभाल कार्यक्रम के तहत प्रसव के बाद 42 दिनों तक आशा कार्यकर्ता जच्चा-बच्चा की नियमित निगरानी करती हैं। गृह भ्रमण के दौरान नवजात के स्तनपान, सांस लेने, शरीर के तापमान, स्वच्छता और गतिविधियों की जानकारी ली जाती है। वहीं प्रसूता में कमजोरी, बुखार, रक्तस्राव और स्तनपान संबंधी समस्याओं की भी जांच की जाती है।

आशा कार्यकर्ता परिवारों को हाथ धोने, नाल की साफ-सफाई, नवजात को गर्म रखने और जन्म के बाद शीघ्र स्तनपान कराने के प्रति जागरूक करती हैं। बच्चे का दूध नहीं पीना, अत्यधिक सुस्ती, सांस लेने में परेशानी तथा शरीर का बहुत ठंडा या गर्म होना जैसे खतरे के संकेतों की जानकारी भी दी जाती है। इधर, आशा कार्यकर्ताओं के कार्यों की निगरानी और अभिलेखों के डिजिटलीकरण पर भी जोर दिया गया है। जिले की सभी आशाओं के रजिस्टर तीन दिनों के भीतर अद्यतन व डिजिटलीकृत करने का निर्देश दिया गया है। पंचायतवार निगरानी के लिए बीएचएम, बीसीएम और बीएमई को नोडल बनाया गया है। डीडीए सुमन सिन्हा ने कहा कि प्रसव के बाद 42 दिन मां और बच्चे दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। बुधवार को सिविल सर्जन डॉ. राज कुमार चौधरी ने कहा कि आशा के नियमित गृह भ्रमण से नवजात में खतरे के संकेतों की समय पर पहचान कर उसे स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने में मदद मिलती है।

हिन्दुस्थान समाचार / धर्मेन्द्र सिंह