अनंत फल की प्राप्ति के लिए की जाती है भगवान अनंत की पूजन : आचार्य धर्मेंद्र
सुपौल, 25 सितंबर (हि.स.)। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी के अवसर पर शुक्रवार को देशभर में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ भगवान अनंत की पूजा-अर्चना की।
मैथिल परंपरा के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की विधि-विधान से पूजा करने की परंपरा है।
मैथिल पंडित आचार्य धर्मेंद्र ने बताया कि भगवान अनंत की पूजा अनंत फल की प्राप्ति तथा परिवार एवं राष्ट्र के कल्याण की भावना से की जाती है।
उन्होंने बताया कि पूजन के दौरान सर्वप्रथम सूर्यादि पंचदेवताओं और भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इसके बाद सकल परिवार एवं संपूर्ण राष्ट्र के कल्याण की भावना से संकल्प लेकर भगवान अनंत की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करनी चाहिए। पूजा के उपरांत भगवान अनंत की कथा का श्रवण करने की भी परंपरा है।
आचार्य धर्मेंद्र के अनुसार भगवान अनंत के पूजन में धूप, दीप के साथ विभिन्न प्रकार के पकवानों का भोग लगाया जाता है। इनमें पूरी, मालपुआ, टिकरी, खजुरी, पूरीकिया, लड्डू और पान आदि प्रमुख हैं। भोग लगाने के बाद आरती की जाती है और निर्धारित विधि के अनुसार पूजा का समापन किया जाता है।
उन्होंने बताया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी की सुबह अगस्त्य ऋषि को अर्घ्यदान करने की परंपरा भी प्राचीन काल से चली आ रही है। अगस्त्य ऋषि की प्रसन्नता के लिए किए जाने वाले इस अर्घ्यदान एवं तर्पण को ‘अगस्त्य तर्पण’ कहा जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार अगस्त्य तर्पण करने से श्रद्धालुओं के मनोरथ पूर्ण होते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
हिन्दुस्थान समाचार / विनय कुमार मिश्र