Sawan 2026: काशी का दक्षिण द्वार है शूलटंकेश्वर महादेव मंदिर, भगवान शिव ने यहीं त्रिशूल से रोका था मां गंगा के वेग को

काशी से 15 किलोमीटर दूर स्थित शिवालय है, जिसका नाम शूलटंकेश्वर महादेव मंदिर है।वाराणसी का यह मंदिर काशी के दक्षिण भाग में अवस्थित है।इन्हीं मंदिर के घाटों से गंगा उत्तरवाहिनी होकर काशी में प्रवेश करती हैं।इसलिए इस मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है रोहनिया विधानसभा क्षेत्र के माधोपुर में गंगा तट पर शूलटंकेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। चुनार रोड पर खनांव के पास एक बड़ा द्वार बनाया गया है। दर्शन-पूजन के लिए यहां आम दिनों में तो श्रद्धालु आते ही हैं, शिवरात्रि और सावन में काफी भीड़ होती है। पौराणिक महत्व के इस मंदिर का शिव पुराण में भी उल्लेख है।

 

 

 

 काशी से 15 किलोमीटर दूर स्थित शिवालय है, जिसका नाम शूलटंकेश्वर महादेव मंदिर है।वाराणसी का यह मंदिर काशी के दक्षिण भाग में अवस्थित है।इन्हीं मंदिर के घाटों से गंगा उत्तरवाहिनी होकर काशी में प्रवेश करती हैं।इसलिए इस मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है रोहनिया विधानसभा क्षेत्र के माधोपुर में गंगा तट पर शूलटंकेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। चुनार रोड पर खनांव के पास एक बड़ा द्वार बनाया गया है। दर्शन-पूजन के लिए यहां आम दिनों में तो श्रद्धालु आते ही हैं, शिवरात्रि और सावन में काफी भीड़ होती है। पौराणिक महत्व के इस मंदिर का शिव पुराण में भी उल्लेख है।

विशेष आयोजन के लिए महत्व:
गंगा का किनारा और खुला-खुला मंदिर लोगों को आकर्षित करता है। यहां मंदिर परिसर में मां दुर्गा और राधा कृष्ण मंदिर के अलावा सीकड़ बाबा की कुटिया है। सावन और शिवरात्रि के अलावा छठ पूजा और देव दीपावली पर भी काफी श्रद्धालु जुटते हैं। दर्शन-पूजन संग सैर-सपाटा के लिए भी अब बड़ी संख्या में लोग यहां आने लगे हैं। प्रदेश सरकार की ओर से मंदिर क्षेत्र का सुंदरीकरण भी कराया गया है।

काशी खंड में 'आनंद वन' के नाम से जाना जाता था:
शूलटंकेश्वर महादेव मंदिर (रोहनिया वाराणसी) के पास से गंगा उत्तरवाहिनी होकर काशी में प्रवेश करती हैं। मंदिर के पुजारी राजेंद्र गिरी बताते हैं कि माधव ऋषि ने गंगा अवतरण के पूर्व शिव की आराधना के लिए शिवलिंग की स्थापना की थी। भगवान शिव ने इसी स्थान पर अपने त्रिशूल से गंगा के वेग को रोक कर उनसे वचन लिया था कि वह काशी को स्पर्श करते हुए प्रवाहित होंगी। साथ ही काशी में गंगा स्नान करने वाले किसी भक्त को जलीय जीव से हानि नहीं होगी। गंगा ने जब दोनों वचन स्वीकार कर लिए, तब शिव ने अपना त्रिशूल हटाया। इस जगह को काशी खंड में 'आनंद वन' के नाम से जाना जाता था। इसे काशी का दक्षिण द्वार भी कहा जाता है।

मंदिर का इतिहास:
मान्यता है कि गंगा अवतरण के समय भगवान शिव को काशी की सुरक्षा की चिंता सताने लगी। उन्होंने यहीं अपना त्रिशूल गाड़कर गंगा के वेग को रोका था। इसलिए इनका नाम शूलटंकेश्वर पड़ा। द्वापर में ब्रह्मा ने यहां वीरेश्वर महादेव के शिवलिंग की स्थापना की। दक्षिण दिशा में विराजमान शूलटंकेश्वर विपत्तियों से इस नगरी की रक्षा करते हैं। कालांतर में किसी राजघराने की ओर से इसे छोटे मंदिर का रूप दिया गया, जिसे स्थानीय लोगों ने 1980 के दशक में विस्तार दिया।

बाबा पूरी करते हैं हर भक्त की मनोकामना
मन्दिर के पुजारी ने बताया कि इसके पीछे धारणा यह थी कि जिस प्रकार यहां मां गंगा का कष्ट दूर हुआ, उसी प्रकार अन्य भक्तों का भी कष्ट दूर होगा।यही वजह है कि पूरे वर्ष यहां भक्तों का तांता लगा रहता है।सभी भक्त अपनी मनोकामना को पूरा करने के लिए यहां आते हैं।सावन के महीने में तो यहां दूरदराज से भी भक्त आते हैं, लेकिन इस वर्ष मंदिर बन्द होने के कारण इक्का-दुक्का ही भक्त आ रहे हैं और दूर से दर्शन करके जा रहे हैं।