योग और आयुर्वेद से स्वस्थ जीवन का संदेश, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय संगोष्ठी आयोजित

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के योग साधना केंद्र में गुरुवार को “मानव जीवन में योग तथा आयुर्वेद का महत्व” विषय पर एक दिवसीय अखिल भारतीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भाग लेते हुए योग एवं आयुर्वेद की वर्तमान समय में उपयोगिता और प्रासंगिकता पर विस्तृत चर्चा की।
 

वाराणसी। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के योग साधना केंद्र में गुरुवार को “मानव जीवन में योग तथा आयुर्वेद का महत्व” विषय पर एक दिवसीय अखिल भारतीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भाग लेते हुए योग एवं आयुर्वेद की वर्तमान समय में उपयोगिता और प्रासंगिकता पर विस्तृत चर्चा की।

संगोष्ठी की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विहारी लाल शर्मा ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि योग और आयुर्वेद भारतीय ज्ञान परंपरा की ऐसी अमूल्य धरोहर हैं, जो केवल रोगों के उपचार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मानव के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास का समग्र मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। उन्होंने कहा कि आज के तनावपूर्ण और असंतुलित जीवन में योग एवं आयुर्वेद स्वस्थ और संतुलित जीवन का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने युवाओं से भारतीय ज्ञान-विज्ञान की इस महान परंपरा को अपनाने का आह्वान किया।

मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित काय चिकित्सक डॉ. अजय कुमार ने कहा कि आयुर्वेद केवल एक चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि स्वस्थ और संतुलित जीवन जीने का विज्ञान है। उन्होंने दिनचर्या, ऋतुचर्या, संतुलित आहार-विहार तथा नियमित योगाभ्यास के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आधुनिक जीवनशैली से उत्पन्न अधिकांश बीमारियों का समाधान योग और आयुर्वेद के समन्वित प्रयोग में निहित है।

विशिष्ट वक्ता प्रो. रामपूजन पाण्डेय ने कहा कि भारतीय ऋषियों द्वारा विकसित योग और आयुर्वेद मानव कल्याण के लिए अत्यंत उपयोगी ज्ञान-विज्ञान हैं, जिन्हें आज पूरी दुनिया स्वीकार कर रही है। वरिष्ठ आचार्य प्रो. सुधाकर मिश्र ने कहा कि योग व्यक्ति में आत्मानुशासन, आत्मविश्वास और आत्मबोध का विकास करता है, जबकि आयुर्वेद प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने की प्रेरणा देकर दीर्घकालिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करता है।

छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष एवं सारस्वत वक्ता प्रो. शैलेश कुमार मिश्र ने योग और आयुर्वेद को भारतीय संस्कृति की आत्मा बताते हुए कहा कि इनके माध्यम से व्यक्ति न केवल निरोगी रहता है, बल्कि नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से भी समृद्ध बनता है। उन्होंने विद्यार्थियों से नियमित योगाभ्यास और स्वास्थ्यपरक जीवनशैली अपनाने का आग्रह किया।

संगोष्ठी में प्रो. जितेन्द्र कुमार और प्रो. राजनाथ ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. दुर्गेश पाठक ने आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रमों का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा के वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक पक्ष को समाज के सामने लाना है। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन एवं मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुआ। अंत में प्रो. रविशंकर पाण्डेय ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। राष्ट्रकल्याण, मानव स्वास्थ्य और भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण-संवर्धन के संकल्प के साथ संगोष्ठी का समापन हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।