वाराणसी : यथार्थ गीता के अध्ययन से जीवन की शंकाओं का होता है समाधान : नारद महाराज

मिर्जामुराद क्षेत्र के करधना गांव स्थित परमहंस आश्रम में शनिवार को हनुमान जयंती के अवसर पर वार्षिक भंडारे एवं सत्संग का आयोजन किया गया। इसमें यथार्थ गीता के रचयिता परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज के शिष्यों का दल शक्तेषगढ़ आश्रम से पहुंचा। संतों ने प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति, सत्संग और सद्गुरु की शरण में रहने का संदेश दिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की और प्रसाद ग्रहण किया।
 

वाराणसी। मिर्जामुराद क्षेत्र के करधना गांव स्थित परमहंस आश्रम में शनिवार को हनुमान जयंती के अवसर पर वार्षिक भंडारे एवं सत्संग का आयोजन किया गया। इसमें यथार्थ गीता के रचयिता परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज के शिष्यों का दल शक्तेषगढ़ आश्रम से पहुंचा। संतों ने प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति, सत्संग और सद्गुरु की शरण में रहने का संदेश दिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की और प्रसाद ग्रहण किया।

इस दौरान स्वामी अड़गड़ानंद महाराज के वरिष्ठ शिष्य नारद महाराज ने कहा कि मनुष्य को जीवन में सही मार्गदर्शन के लिए सतगुरु की शरण में जाना चाहिए। यथार्थ गीता का नियमित अध्ययन करने से जीवन की अनेक शंकाओं का समाधान मिलता है। इसके अध्ययन से मनुष्य मोह-माया से मुक्त होकर ईश्वर की भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि सतगुरु के स्वरूप को समझकर ओम राम नाम का जाप करने से जीवन का कल्याण संभव है। उन्होंने प्रत्येक घर तक यथार्थ गीता पहुंचाने की अपील भी की।

वहीं, तानसेन महाराज ने हनुमान जी की अटूट भक्ति और उनकी आध्यात्मिक शक्ति का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि लंका में रावण ने 80 हजार राक्षसों को साधु के वेश में माला जपते हुए बैठा दिया था। प्रभु श्रीराम के सच्चे भक्त हनुमान जी ने अपनी भक्ति शक्ति से उनकी वास्तविकता पहचान ली। इसके बाद विभीषण से मिलकर उन्हें सच्ची रामभक्ति का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि हनुमान जी का जीवन समर्पण, निष्ठा और निष्काम भक्ति की प्रेरणा देता है।

कार्यक्रम के अंत में परमहंस आश्रम करधना के महंत सूरदास महाराज के नेतृत्व में विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। इसमें श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। वहीं, यथार्थ गीता रथ के माध्यम से श्रद्धालुओं को रियायती दर पर यथार्थ गीता की प्रतियां भी उपलब्ध कराई गईं। संतों ने लोगों से धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर उनके संदेशों को जीवन में अपनाने का आह्वान किया।