वाराणसी में बेशकीमती जमीन के विवाद में दो कानूनगो और लेखपाल को राहत, अदालत ने फौजदारी निगरानी याचिका की खारिज
- अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत ने निचली अदालत के आदेश को रखा बरकरार, नहीं मिली कोई विधिक या तथ्यात्मक त्रुटि
- राजस्व कर्मचारियों पर फर्जी रिपोर्ट तैयार कर जमीन पर अवैध कब्जा कराने का लगाया गया था आरोप
वाराणसी। बेशकीमती जमीन के विवाद में पिंडरा और राजातालाब तहसील से जुड़े दो राजस्व निरीक्षकों (कानूनगो) और एक लेखपाल को अदालत से राहत मिली है। अपर सत्र न्यायाधीश एफटीसी (14वां वित्त आयोग) की अदालत ने फौजदारी निगरानी संख्या 05/2026, जितेंद्र कुमार मौर्य बनाम उत्तर प्रदेश सरकार आदि मामले में दाखिल निगरानी याचिका खारिज कर दी। अदालत ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, वाराणसी द्वारा 12 दिसंबर 2025 को पारित आदेश को सही ठहराते हुए उसमें किसी प्रकार की विधिक या तथ्यात्मक त्रुटि नहीं पाई।
दो कानूनगो और लेखपाल पर लगे थे गंभीर आरोप
मामला पिंडरा तहसील के बैजलपट्टी क्षेत्र की बेशकीमती जमीन से संबंधित है। परिवादी जितेंद्र कुमार मौर्य ने आरोप लगाया था कि बैजलपट्टी के लेखपाल सुशील कुमार श्रीवास्तव, अठगांवा के तत्कालीन कानूनगो योगेंद्र कुमार सिंह और उनके स्थानांतरण के बाद आए राजस्व निरीक्षक भोला शंकर गौतम ने अपने पद एवं कर्तव्यों का दुरुपयोग किया।
परिवादी का आरोप था कि राजस्व कर्मचारियों ने अन्य विपक्षियों को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से कथित साजिश में शामिल होकर प्रशासन को फर्जी एवं कूटरचित रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसके चलते उनकी कीमती जमीन को लेकर धोखाधड़ी हुई और विपक्षियों ने जमीन पर अवैध कब्जा कर निर्माण भी करा लिया।
सीजेएम कोर्ट के आदेश को दी थी चुनौती
इस मामले में परिवादी जितेंद्र कुमार मौर्य ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, वाराणसी की अदालत में प्रकीर्ण प्रार्थना पत्र संख्या 3635/2025 दाखिल किया था। न्यायालय ने 12 दिसंबर 2025 को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 173(4) के अंतर्गत प्रस्तुत प्रार्थना पत्र निरस्त कर दिया था।
इस आदेश से असंतुष्ट होकर जितेंद्र कुमार मौर्य ने अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत में फौजदारी निगरानी याचिका दाखिल की। निगरानीकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर जमीन का बैनामा कराया गया और उनकी भूमि पर अवैध कब्जा कर निर्माण किया गया।
निगरानीकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि विचारण न्यायालय ने उनके द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों का समुचित परीक्षण नहीं किया। उपलब्ध साक्ष्यों को पर्याप्त महत्व दिए बिना विधि विरुद्ध तरीके से प्रार्थना पत्र निरस्त कर दिया गया।
अदालत ने कहा- निचली अदालत के आदेश में कोई त्रुटि नहीं
अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत ने निगरानीकर्ता और विपक्षी पक्ष के अधिवक्ताओं की दलीलें सुनीं। साथ ही मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत द्वारा पारित आदेश और संबंधित अभिलेखों का अवलोकन किया।
दोनों पक्षों को सुनने और अभिलेखों के परीक्षण के बाद अदालत ने पाया कि विचारण न्यायालय द्वारा 12 दिसंबर 2025 को पारित आदेश में कोई विधिक अथवा तथ्यात्मक त्रुटि नहीं है। ऐसे में फौजदारी निगरानी याचिका स्वीकार किए जाने का कोई आधार नहीं बनता।
अदालत ने फौजदारी निगरानी संख्या 05/2026 निरस्त करते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के 12 दिसंबर 2025 के आदेश की पुष्टि कर दी।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने की राजस्व कर्मचारियों की पैरवी
मामले में राजस्व कर्मचारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता धीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, डॉ. देवेश श्रीवास्तव, चन्द्रकांत सिंह और सारांश श्रीवास्तव ने अदालत में पैरवी की।
अदालत के इस आदेश से संबंधित दोनों राजस्व निरीक्षकों और लेखपाल को निगरानी कार्यवाही में राहत मिली है। हालांकि, यह आदेश निगरानी याचिका के निस्तारण से संबंधित है, न कि जमीन के स्वामित्व या कब्जे के विवाद का अंतिम निर्णय।