यम-नियम के पालन से ही प्रशस्त होगा कुंडलिनी जागरण का मार्ग, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने देवी कृपा, गुरु कृपा और निरंतर प्रयास को बताया आध्यात्मिक उन्नति का आधार 

आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए जीवन में यम और नियम का पालन अनिवार्य है। आचरण की शुद्धता, आत्मसंयम और अनुशासन के बिना उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियों को धारण करना संभव नहीं है। यह संदेश जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने साधकों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करते हुए दिया। उन्होंने कहा कि कुंडलिनी जागरण की दिशा में आगे बढ़ने से पहले साधकों को अपने जीवन में यम-नियम को आत्मसात करना चाहिए।
 

 

वाराणसी। आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए जीवन में यम और नियम का पालन अनिवार्य है। आचरण की शुद्धता, आत्मसंयम और अनुशासन के बिना उच्च आध्यात्मिक अनुभूतियों को धारण करना संभव नहीं है। यह संदेश जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने साधकों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करते हुए दिया। उन्होंने कहा कि कुंडलिनी जागरण की दिशा में आगे बढ़ने से पहले साधकों को अपने जीवन में यम-नियम को आत्मसात करना चाहिए।

 

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के अनुसार, साधना की सफलता के लिए मजबूत आध्यात्मिक आधार आवश्यक है। यम और नियम के माध्यम से व्यक्ति अपने आचरण को शुद्ध करता है और आत्मनियंत्रण विकसित करता है। जब साधक का जीवन संयम और अनुशासन से परिपूर्ण होता है, तभी वह उच्च आध्यात्मिक साधनाओं के लिए स्वयं को तैयार कर सकता है। उन्होंने साधकों को जल्दबाजी से बचने और नैतिक मूल्यों को जीवन में प्राथमिकता देने की सलाह दी।

 

कुंडलिनी जागरण के तीन प्रमुख मार्ग
जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने कुंडलिनी शक्ति के जागरण के संदर्भ में देवी कृपा, गुरु कृपा और साधना को प्रमुख आधार बताया। उन्होंने कहा कि जगदम्बा की अहैतुकी अनुकंपा और भगवद्-अनुग्रह साधक के आध्यात्मिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी प्रकार तत्त्वदर्शी गुरु का मार्गदर्शन, आशीर्वाद और शक्तिपात साधना को उचित दिशा प्रदान करते हैं।

 

इसके साथ ही साधक का निरंतर, निष्ठापूर्वक और अनुशासित प्रयास भी आवश्यक है। देवी कृपा, गुरु कृपा और साधना के समन्वय से आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। शंकराचार्य जी ने स्पष्ट किया कि साधना केवल किसी विशेष अनुभव को प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि स्वयं के आचरण और चेतना को परिष्कृत करने की प्रक्रिया भी है।

शिविर में प्रतिदिन हो रहे धार्मिक अनुष्ठान
साधना शिविर के अंतर्गत प्रतिदिन सुबह 4:30 बजे प्रातः मंगलम्, सुबह छह बजे साधना शिविर तथा 8:30 बजे महापूजा और नवचंडी पाठ आयोजित किया जा रहा है। अपराह्न दो बजे शिविर का दूसरा सत्र शुरू होता है। इसके बाद शाम को विशेष अर्चन संपन्न किया जा रहा है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से साधकों को आध्यात्मिक चिंतन, साधना और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ने का अवसर मिल रहा है।