छन्दोविच्छित्ति की बारीकियाँ सीख रहे विद्यार्थी, सप्तदिवसीय कार्यशाला से सुदृढ़ होंगे शास्त्रीय कौशल

वाराणसी। भारतीय ज्ञान परम्परा के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के भारतीय ज्ञान परम्परा केन्द्र के तत्वावधान में छन्दोविच्छित्ति विषय पर सप्तदिवसीय विशेष कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यशाला 16 जनवरी से 22 जनवरी 2026 तक ऑनलाइन एवं ऑफलाइन—दोनों माध्यमों से संचालित हो रही है, जिसमें विद्यार्थी और शोधार्थी छन्द निर्माण की प्रक्रिया को सैद्धान्तिक और व्यावहारिक रूप से समझ रहे हैं।
 

वाराणसी। भारतीय ज्ञान परम्परा के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के भारतीय ज्ञान परम्परा केन्द्र के तत्वावधान में छन्दोविच्छित्ति विषय पर सप्तदिवसीय विशेष कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यशाला 16 जनवरी से 22 जनवरी 2026 तक ऑनलाइन एवं ऑफलाइन—दोनों माध्यमों से संचालित हो रही है, जिसमें विद्यार्थी और शोधार्थी छन्द निर्माण की प्रक्रिया को सैद्धान्तिक और व्यावहारिक रूप से समझ रहे हैं।

देश के प्रख्यात विद्वान से मिल रहा व्यावहारिक प्रशिक्षण
इस कार्यशाला में देश के सुप्रसिद्ध अष्टावधानी विद्वान डॉ. एन. उमा महेश्वर प्रतिभागियों को छन्दोविच्छित्ति का गहन प्रशिक्षण दे रहे हैं। उनके मार्गदर्शन में वैदिक, लौकिक और आधुनिक छन्दों की पहचान, लक्षण, गणना-विधि और प्रयोगात्मक अभ्यास कराया जा रहा है, जिससे प्रतिभागियों की समझ और दक्षता दोनों में वृद्धि हो रही है।

संस्कृत काव्यशास्त्र की आधारशिला है छन्दोविच्छित्ति
केन्द्र के समन्वयक प्रो. दिनेश कुमार गर्ग ने छन्दोविच्छित्ति को संस्कृत काव्यशास्त्र की आधारशिला बताते हुए कहा कि छन्दों का सूक्ष्म ज्ञान काव्यबोध, रसास्वादन और शास्त्रीय अध्ययन को समृद्ध करता है। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्यशालाएँ विद्यार्थियों में शास्त्रीय अनुशासन और विश्लेषणात्मक दृष्टि विकसित करती हैं।

परम्परा, वैज्ञानिकता और समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश
उद्घाटन व्याख्यान में डॉ. एन. उमा महेश्वर ने छन्दोविच्छित्ति की परम्परा, उसकी वैज्ञानिक संरचना और वर्तमान शैक्षणिक परिप्रेक्ष्य में उसकी प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि छन्द केवल गणना का विषय नहीं, बल्कि काव्य की अंतर्लय, संगीतात्मकता और सौन्दर्यबोध को समझने का माध्यम है।

कुलपति ने बताया—नवीन दृष्टि देगी कार्यशाला
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि यह सप्तदिवसीय कार्यशाला छन्दशास्त्र के अध्ययन-अध्यापन को नई दृष्टि प्रदान करेगी और प्रतिभागियों के शास्त्रीय कौशल को सुदृढ़ बनाएगी। उन्होंने ऐसे आयोजनों को भारतीय ज्ञान परम्परा के पुनर्जागरण के लिए आवश्यक बताया।

संगीतात्मकता और सौन्दर्यबोध की कुंजी
कार्यशाला के संयोजक डॉ. ज्ञानेन्द्र सापकोटा ने अपने सारगर्भित व्याख्यान में कहा कि छन्दोविच्छित्ति केवल छन्दों की गणना नहीं, बल्कि संस्कृत काव्य की लय, संगीतात्मकता और सौन्दर्यबोध को समझने की कुंजी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि काव्यपाठ, व्याख्या और सृजन—तीनों के लिए छन्दशास्त्र का सम्यक् ज्ञान अनिवार्य है।

विद्वानों और शोधार्थियों की रही गरिमामयी उपस्थिति
कार्यक्रम का शुभारम्भ वैदिक और लौकिक मंगलाचरण से हुआ। कार्यक्रम का संचालन और धन्यवादज्ञापन डॉ. आशीष मणि त्रिपाठी ने किया। इस अवसर पर प्रो. दिनेश कुमार गर्ग, डॉ. दुर्गेश पाठक, डॉ. ज्ञानेन्द्र सापकोटा, डॉ. मधुसूदन मिश्र, डॉ. गोविन्द पौडेल सहित अनेक विद्वान आचार्य, शोधार्थी और संस्कृतप्रेमी विद्यार्थी उपस्थित रहे।

संस्कृत काव्यपरम्परा के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
छन्दोविच्छित्ति पर केंद्रित यह कार्यशाला संस्कृत काव्यपरम्परा के संरक्षण, संवर्धन और नवपीढ़ी में शास्त्रीय चेतना के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखी जा रही है, जिससे विद्यार्थियों को परम्परा से जुड़ते हुए आधुनिक संदर्भों में आगे बढ़ने का अवसर मिल रहा है।