गंगा संरक्षण के लिए सरकार के साथ जनभागीदारी भी जरूरी, नमामि गंगे अभियान को प्रभावी बनाने के लिए सीवेज, औद्योगिक कचरे और अनियंत्रित दोहन पर रोक जरूरी
वाराणसी। गंगा भारत की सभ्यता, संस्कृति, आस्था और जीवन से गहराई से जुड़ी नदी है। इसके किनारे सदियों से नगरों, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक गतिविधियों का विकास हुआ है। हालांकि औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, बढ़ती आबादी और प्रदूषण के दबाव ने गंगा की स्वच्छता और अविरलता के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी की हैं। ऐसे में गंगा को निर्मल और अविरल बनाए रखने के लिए सरकार के प्रयासों के साथ समाज की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी मानी जा रही है।
केंद्र सरकार के नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत गंगा की सफाई के साथ उसके पारिस्थितिकीय तंत्र, जैव विविधता और प्राकृतिक प्रवाह के संरक्षण पर भी जोर दिया जा रहा है। गंगा में प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में औद्योगिक अपशिष्ट, अनुपचारित सीवेज, घरेलू कचरा, कृषि क्षेत्र से बहकर आने वाले रसायन और नदी के जल का अनियंत्रित दोहन शामिल हैं।
औद्योगिक कचरे पर प्रभावी निगरानी जरूरी
गंगा किनारे संचालित औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले प्रदूषित जल को बिना शोधन नदी में जाने से रोकना महत्वपूर्ण है। इसके लिए औद्योगिक इकाइयों में प्रदूषण नियंत्रण और अपशिष्ट शोधन की व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू करनी होगी। नियमों का उल्लंघन करने वाली इकाइयों पर नियमानुसार कार्रवाई भी जरूरी है।
सीवेज प्रबंधन सबसे बड़ी चुनौती
शहरों से निकलने वाले नालों और सीवेज को गंगा में पहुंचने से रोकना स्वच्छता अभियान की महत्वपूर्ण कड़ी है। इसके लिए स्थापित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों का नियमित और प्रभावी संचालन सुनिश्चित करना होगा। घरेलू कचरे, प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट के उचित निस्तारण की जिम्मेदारी नगर निकायों के साथ नागरिकों की भी है।
अविरल प्रवाह और खनन पर ध्यान
गंगा को केवल साफ करना पर्याप्त नहीं है। उसके प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखना भी जरूरी है। जलविद्युत और अन्य परियोजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन का ध्यान रखने के साथ नदी में अनियंत्रित बालू खनन पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है। अत्यधिक खनन से तटीय क्षेत्रों और जलीय पारिस्थितिकी पर असर पड़ सकता है।
कृषि और शहरीकरण का भी असर
गंगा किनारे बढ़ते शहरी दबाव को देखते हुए भविष्य की योजनाओं में नदी और उसके तटीय क्षेत्रों के संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी। कृषि क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के संतुलित इस्तेमाल तथा जल के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देना भी आवश्यक है।
तटवर्ती क्षेत्रों में पौधरोपण और स्थानीय प्रजातियों की हरियाली बढ़ाने से मिट्टी के कटाव को कम करने और जैव विविधता को मजबूत करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, गंगा में मौजूद जलीय जीवों का संरक्षण भी नदी के पारिस्थितिकीय संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है।
सामूहिक प्रयास से ही लक्ष्य संभव
गंगा संरक्षण को केवल सरकारी अभियान मानकर सफलता हासिल नहीं की जा सकती। नागरिकों को गंगा में कूड़ा, प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट डालने से बचना होगा। स्थानीय निकायों, स्वयंसेवी संस्थाओं, उद्योगों, किसानों और आम लोगों के समन्वित प्रयास से ही नमामि गंगे का उद्देश्य प्रभावी रूप से पूरा हो सकता है। गंगा की स्वच्छता और अविरलता पर्यावरण के साथ देश की सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखने का भी विषय है।