माँ गंगा के तट पर जुटे 400 से अधिक कलाकार, रेत से रची गई कला की अनूठी दुनिया
वाराणसी। माँ गंगा के पावन तट पर सोमवार को रचनात्मकता का अद्भुत संगम देखने को मिला, जब आधुनिक मूर्तिशिल्प के अग्रदूत गुरु राम छाटपार के 81वें जन्मदिवस के अवसर पर ‘रेत में आकृति की खोज’ का 24वाँ वार्षिक आयोजन भव्य रूप से सम्पन्न हुआ। “राम छाटपार शिल्पन्यास, भारत” के तत्वावधान में आयोजित इस एक दिवसीय कार्यशाला में सैकड़ों कलाकारों ने केवल रेत के माध्यम से अपनी कल्पनाओं को आकार देकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
गंगा तट पर सुबह से शाम तक रचनात्मक प्रयोग
प्रातः 10 बजे से सायं 4 बजे तक गंगा तट पर उभरे विस्तृत रेत के टापुओं पर यह कार्यशाला आयोजित की गई। बहती गंगा की धारा, खुला आकाश और रेत का विशाल विस्तार कलाकारों के लिए जीवंत कैनवास बन गया। कलाकारों की उँगलियों से उभरती आकृतियाँ प्रकृति और कला के सुंदर संवाद का प्रतीक बनी रहीं।
400 से अधिक कलाकारों की सहभागिता
इस आयोजन में लगभग 400 से 500 कलाकारों ने भाग लिया। स्थानीय कलाकारों के साथ-साथ काशी हिंदू विश्वविद्यालय और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ सहित गोरखपुर, आजमगढ़, लखनऊ, इलाहाबाद और देश के विभिन्न राज्यों से आए ललित कला के छात्र व कलाकार शामिल हुए। विभिन्न आयु वर्ग और पृष्ठभूमि के कलाकार पूरे मनोयोग से अपनी कृतियों में जुटे दिखाई दिए।
36 वर्षों की परंपरा और संस्थागत यात्रा
राम छाटपार शिल्पन्यास की स्थापना वर्ष 1989 में स्वर्गीय गुरु राम छाटपार की स्मृति में उनके शिष्यों, मित्रों और कलाकारों के सहयोग से की गई थी। आधुनिक एवं समकालीन मूर्तिकला को समर्पित यह संस्था बीते 36 वर्षों से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों के माध्यम से कला जगत में अपनी सशक्त पहचान बना चुकी है। शिल्पन्यास के अध्यक्ष पद पर पद्मश्री से सम्मानित स्वर्गीय प्रो. शंखो चौधुरी जैसे वरिष्ठ मूर्तिकार भी रहे।
कला और समाज का जीवंत संवाद
‘रेत में आकृति की खोज’ को भारत का एकमात्र ऐसा आयोजन माना जाता है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर की विशेषता रखता है। पिछले 24 वर्षों से यह आयोजन वाराणसी के कला-विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कलाकारों ने रेत को कैनवास मानकर वर्ष भर की सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं, मानवीय संवेदनाओं, अच्छाइयों-बुराइयों और समकालीन विषयों को अपनी कृतियों में ढाला। कहीं पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिखा तो कहीं सामाजिक समरसता और शांति का भाव।
दर्शकों को मिली सौंदर्य और संवेदना की अनुभूति
माँ गंगा की लहरों के साथ रेत के टीलों पर आकार लेती कलाकृतियाँ दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी रहीं। मानवीय भावनाओं की इस जीवंत अभिव्यक्ति ने कला-प्रेमियों को ठहरकर देखने और सराहना करने को विवश कर दिया। शहर के साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और प्रतिष्ठित नागरिकों की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और बढ़ाया।
कलाकारों का सम्मान और आभार
हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी चयनित कलाकारों को “राम छाटपार शिल्पन्यास, भारत” की ओर से एक-एक हजार रुपये की नगद पुरस्कार राशि देकर प्रोत्साहित किया गया। समापन अवसर पर संयोजकों ने सभी कलाकारों, सहयोगियों और दर्शकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए आयोजन को सफल बनाने में मिले सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।
गंगा तट से समाज तक कला का संदेश
‘रेत में आकृति की खोज’ ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि कला जब प्रकृति और समाज से जुड़ती है, तो वह केवल दृश्य सौंदर्य नहीं रचती, बल्कि विचार और संवेदना का विस्तार भी करती है। यह आयोजन वाराणसी की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊर्जा देने वाला एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनकर उभरा।