जन्माष्टमी केवल उत्सव नहीं, भीतर के प्रकाश को जगाने का पर्व : प्रो. बिहारीलाल शर्मा

भारतीय संस्कृति में पर्व केवल उत्सव मनाने के अवसर नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को पुनः स्मरण करने के माध्यम भी हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी ऐसा ही लोकपर्व है, जिसमें भक्ति के साथ दर्शन, आस्था के साथ विवेक और परंपरा के साथ लोकमंगल का समन्वय दिखाई देता है। जन्माष्टमी की पूर्व संध्या पर प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने अपने विशेष विचार साझा करते हुए कहा कि कृष्ण का जन्म अंधकार के बीच प्रकाश, अधर्म के बीच धर्म और निराशा के बीच आशा के उदय का प्रतीक है।
 

वाराणसी। भारतीय संस्कृति में पर्व केवल उत्सव मनाने के अवसर नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को पुनः स्मरण करने के माध्यम भी हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी ऐसा ही लोकपर्व है, जिसमें भक्ति के साथ दर्शन, आस्था के साथ विवेक और परंपरा के साथ लोकमंगल का समन्वय दिखाई देता है। जन्माष्टमी की पूर्व संध्या पर प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने अपने विशेष विचार साझा करते हुए कहा कि कृष्ण का जन्म अंधकार के बीच प्रकाश, अधर्म के बीच धर्म और निराशा के बीच आशा के उदय का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध तथा विष्णुपुराण आदि में वर्णित श्रीकृष्ण जन्म भारतीय धार्मिक चेतना का महत्वपूर्ण प्रसंग है। मथुरा के कारागार में अत्याचार और अंधकार के बीच कृष्ण का प्राकट्य यह संदेश देता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म और सत्य की विजय संभव है। श्रीमद्भगवद्गीता में कृष्ण द्वारा धर्म की पुनर्स्थापना और साधुओं के संरक्षण का संदेश इसी व्यापक चेतना को अभिव्यक्त करता है।

कर्तव्य और कर्म का संदेश
प्रो. शर्मा के अनुसार श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व जीवन के विविध आयामों को समेटे हुए है। वे बाल रूप में आनंद, गोपाल के रूप में प्रकृति और लोकजीवन से आत्मीयता, मित्र के रूप में विश्वास तथा राजपुरुष के रूप में नीति और उत्तरदायित्व के प्रतीक हैं। कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सारथी के रूप में उन्होंने कर्म, ज्ञान और भक्ति का मार्ग दिखाया।

उन्होंने कहा कि कृष्ण का कर्मयोग आज भी प्रासंगिक है। उनका संदेश मनुष्य को कर्म से पलायन नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ और लोकहितकारी कर्म के लिए प्रेरित करता है।

समरसता और प्रकृति संरक्षण पर जोर
कृष्ण के जीवन को सामाजिक समरसता का भी सशक्त संदेश बताते हुए उन्होंने कहा कि कृष्ण का संबंध राजमहलों के साथ सामान्य जन से भी रहा। सुदामा और विदुर के प्रति उनका व्यवहार बताता है कि मनुष्य की गरिमा पद और संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके मानवीय मूल्यों से निर्धारित होती है।

प्रो. शर्मा ने जन्माष्टमी को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ते हुए कहा कि कृष्ण की लीलाभूमि यमुना, गोवर्धन, वन और ब्रज की प्राकृतिक संस्कृति से जुड़ी रही है। आज कृष्ण-भक्ति का अर्थ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता के साथ उसकी रक्षा करना भी होना चाहिए। यमुना की स्वच्छता, वृक्षारोपण, जैव-विविधता की रक्षा और प्लास्टिक व अपशिष्ट नियंत्रण को उत्सव का हिस्सा बनाने की जरूरत है।

काशी की ज्ञान परंपरा से जुड़ा कृष्ण-दर्शन
उन्होंने कहा कि काशी की समृद्ध ज्ञान परंपरा कृष्ण के गीता-दर्शन को व्यापक संदर्भ प्रदान करती है। ज्ञान केवल बौद्धिक संचय नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण कर्म और लोकमंगल की प्रेरणा है। उन्होंने कहा कि जन्माष्टमी का सबसे गहरा संदेश बाहर के कृष्ण के साथ अपने भीतर सत्य, प्रेम, करुणा, समरसता और विवेक का जन्म कराना है।

प्रो. शर्मा ने कहा कि धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि आचरण है और भक्ति केवल भाव नहीं, बल्कि सेवा है। उन्होंने जन्माष्टमी पर समाज में सत्य, प्रेम, करुणा और लोकमंगल की चेतना विकसित करने का संकल्प लेने का आह्वान किया।