विभाजन की त्रासदी को याद रखना जरूरी, ताकि इतिहास दोहराया न जाए

भारत विभाजन की त्रासदी केवल देश के भूगोल के बंटवारे की घटना नहीं थी, बल्कि लाखों लोगों के विस्थापन, हिंसा और सामाजिक पीड़ा का भयावह अध्याय थी। विभाजन के दौरान हुई घटनाओं को याद रखना इसलिए जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इतिहास से सीख लेकर ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति रोक सकें।
 

वाराणसी। भारत विभाजन की त्रासदी केवल देश के भूगोल के बंटवारे की घटना नहीं थी, बल्कि लाखों लोगों के विस्थापन, हिंसा और सामाजिक पीड़ा का भयावह अध्याय थी। विभाजन के दौरान हुई घटनाओं को याद रखना इसलिए जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इतिहास से सीख लेकर ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति रोक सकें।

विशाल भारत संस्थान की ओर से सुभाष भवन के सभागार में ‘भारत विभाजन का काला अध्याय’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ जम्मू विश्वविद्यालय के पूर्व संकायाध्यक्ष एवं इतिहासकार प्रो. जिगर मोहम्मद ने सुभाष मंदिर में पुष्प अर्पित कर और दीप प्रज्ज्वलित करके किया। मुख्य वक्ता इतिहासकार एवं काशी विद्यापीठ के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार सिंह ने विभाजन की विभीषिका पर आधारित प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।

प्रदर्शनी में विभाजन के समय की तस्वीरों को देखकर उपस्थित लोग भावुक हो उठे। वक्ताओं ने कहा कि वर्ष 1947 में हुए विभाजन ने बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर और जमीन छोड़ने के लिए मजबूर किया। हिंसा और पलायन की त्रासदी ने समाज पर गहरा प्रभाव डाला, जिसकी स्मृतियां आज भी लोगों के मन में मौजूद हैं।

विषय प्रस्तावना रखते हुए काशी हिंदू विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रोफेसर एवं विशाल भारत संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राजीव श्रीगुरुजी ने कहा कि उनके अनुसार नेहरू की राजनीतिक कमजोरी और जिन्ना की जिद ने देश के विभाजन की परिस्थितियां पैदा कीं। उन्होंने कहा कि विभाजन के कारणों और उसके परिणामों का निष्पक्ष अध्ययन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि समय के साथ विभाजन की स्मृति और अधिक महत्वपूर्ण होती जाएगी।

मुख्य अतिथि प्रो. जिगर मोहम्मद ने विभाजन के लिए मुस्लिम लीग की राजनीति को प्रमुख कारण बताया। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासन की नीतियों ने भी भारत में सामुदायिक विभाजन को बढ़ावा दिया। उनके अनुसार इतिहास को केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि विभाजन के इस काले अध्याय को याद रखना जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो।

मुख्य वक्ता प्रो. अशोक कुमार सिंह ने कहा कि भारत का विभाजन किसी एक दिन में नहीं हुआ, बल्कि यह लंबे राजनीतिक घटनाक्रम का परिणाम था। उन्होंने जिन्ना की अलग राष्ट्र की मांग, मुस्लिम लीग की राजनीति और 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे के बाद हुई हिंसा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आजादी की जल्दबाजी और राजनीतिक परिस्थितियों ने भी विभाजन का रास्ता तैयार किया। मौलाना अबुल कलाम आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान और नेताजी सुभाष चंद्र बोस सहित कई नेता विभाजन के विरोध में थे।

साहित्यकार डॉ. कविन्द्र नारायण ने कहा कि यदि तत्कालीन नेतृत्व ने भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को प्राथमिकता दी होती तो संभव है कि विभाजन की स्थिति अलग होती। विशाल भारत संस्थान के प्रदेश अध्यक्ष नौशाद दूबे ने कहा कि विभाजन की त्रासदी को स्मरण करना अखंडता और सामाजिक सौहार्द के लिए जरूरी है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता महंत प्रभु रामदास जी महाराज ने की। संचालन डॉ. नजमा परवीन तथा धन्यवाद ज्ञापन ज्ञान प्रकाश ने किया। इस अवसर पर डॉ. अर्चना भारतवंशी, डॉ. निरंजन श्रीवास्तव, अनिल पाण्डेय, गुलाब श्रीवास्तव, आभा उपाध्याय, शैलेन्द्र शुक्ला, गोपाल कृष्ण श्रीवास्तव, अफसर बाबा, मनोज भारद्वाज, शहाबुद्दीन तिवारी, सत्यम राय, वीरेन्द्र राय, आफताब, विक्की, जीनत रहमान, सृष्टि त्यागी, आस्था जायसवाल, इली, खुशी, उजाला और दक्षिता सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।