सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में गीता जयंती महोत्सव, भाषण प्रतियोगिता में छात्रों ने समझा श्रीमद्भगवद्गीता का मर्म
वाराणसी। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के दीनदयाल उपाध्याय कौशल केंद्र में सोमवार को गीता जयंती महोत्सव के उपलक्ष्य में भाषण प्रतियोगिता का आयोजन उत्साहपूर्वक किया गया। कार्यक्रम में छात्रों ने श्रीमद्भगवद् गीता के दार्शनिक एवं व्यावहारिक संदेशों पर आधारित भाषण प्रस्तुत किए। प्रतियोगिता के परिणामों में रमाशंकर को प्रथम, दुर्गेश पाठक को द्वितीय और प्रियांशु पांडेय को तृतीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जबकि रश्मि श्रीवास्तव को सांत्वना पुरस्कार प्राप्त हुआ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कौशल विकास की निदेशक प्रो. विधु द्विवेदी ने की। उन्होंने अपने उद्बोधन में गीता की जीवनोपयोगी शिक्षाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में समस्याओं की अपेक्षा उनके समाधान की विधि अधिक महत्व रखती है। उन्होंने गीता के प्रसिद्ध श्लोक ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ का उल्लेख करते हुए कहा कि निष्काम कर्म ही मोक्ष और परमगति का मार्ग है। जीवन में उत्पन्न होने वाली ‘क्या करें और क्या न करें’ की दुविधा दूर करने में गीता सदैव मार्गदर्शन प्रदान करती है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, छात्रकल्याण संकायाध्यक्ष प्रो. शैलेश मिश्र ने गीता जयंती का महत्व बताते हुए कहा कि यह हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ भगवद गीता का जन्मोत्सव है, जिसे मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। उन्होंने बताया कि गीता का उपदेश स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में अर्जुन को दिया था, जिसकी कथा संजय द्वारा धृतराष्ट्र को सुनाई गई।
विशिष्ट अतिथि प्रो. हीरककांत चक्रवर्ती ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता सदैव से हिंदू समाज के लिए दार्शनिक मार्गदर्शक और आध्यात्मिक शिक्षक रही है। गीता के श्लोक मनुष्य के आचरण, कर्तव्य और अध्यात्म के समन्वय का अद्भुत मार्ग प्रस्तुत करते हैं। सारस्वत अतिथि पुस्तकालय अध्यक्ष प्रो. राजनाथ ने गीता जयंती को हिंदू धर्म और संस्कृति का महापर्व बताते हुए इसकी प्रासंगिकता पर जोर दिया। कार्यक्रम का संचालन रोहित मिश्र ने किया, आयोजन की जिम्मेदारी अनुराग पांडेय ने संभाली और मंच व्यवस्था अरुण पांडेय द्वारा की गई। कार्यक्रम का समापन कंचन पाठक द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।