शंकराचार्य के कथित अपमान से काशी में उबाल, दंडी संन्यासियों ने रखा सांकेतिक उपवास

वाराणसी। प्रयागराज माघमेला क्षेत्र में मौनी अमावस्या के दिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को स्नान से रोके जाने और संतों–बटुकों के साथ कथित दुर्व्यवहार के विरोध में काशी में तीव्र आक्रोश देखा जा रहा है। इसी क्रम में सोमवार को अस्सी स्थित मुमुक्ष भवन में दंडी संन्यासियों ने सांकेतिक उपवास रखकर शंकराचार्य के समर्थन में विरोध दर्ज कराया और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की।
 

वाराणसी। प्रयागराज माघमेला क्षेत्र में मौनी अमावस्या के दिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को स्नान से रोके जाने और संतों–बटुकों के साथ कथित दुर्व्यवहार के विरोध में काशी में तीव्र आक्रोश देखा जा रहा है। इसी क्रम में सोमवार को अस्सी स्थित मुमुक्ष भवन में दंडी संन्यासियों ने सांकेतिक उपवास रखकर शंकराचार्य के समर्थन में विरोध दर्ज कराया और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की।

सार्वजनिक खेद और परंपरानुसार सम्मान की मांग
उपवास पर बैठे संन्यासियों ने शासन से मांग की कि शंकराचार्य से सार्वजनिक रूप से खेद प्रकट किया जाए और भविष्य में उनकी स्नान-परंपरा के अनुरूप सम्मानजनक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। संन्यासियों का कहना है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि सनातन परंपराओं के सम्मान से जुड़ा है।

क्या है पूरा मामला
संतों के अनुसार, मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य पालकी द्वारा संगम स्नान के लिए जा रहे थे, तभी प्रशासन ने उनकी पालकी को रोक दिया और बार-बार व्यवधान उत्पन्न किया। आरोप है कि लौटते समय मौके पर मौजूद अधिकारियों व सुरक्षाकर्मियों ने संतों और बटुकों के साथ धक्का-मुक्की की। कुछ संतों को शिखा पकड़कर घसीटने और पालकी को अज्ञात लोगों द्वारा लगभग एक किलोमीटर दूर खींच ले जाने की बातें भी कही जा रही हैं। घटना के बाद शंकराचार्य अपने शिविर लौटे और तभी से अन्न-जल त्याग कर धरने पर बैठे हैं।

‘परंपरा का अपमान, समाज आहत’
उपवास स्थल पर संबोधित करते हुए शंकराचार्य के मीडिया प्रभारी संजय पांडेय ने कहा कि सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरु के साथ ऐसा व्यवहार समूचे सनातन समाज को आहत करता है। उन्होंने यह भी कहा कि परंपरा रही है कि प्रशासन स्वयं शंकराचार्य को आदर सहित स्नान कराने ले जाता रहा है; यदि किसी कारणवश स्नान संभव न होता, तब भी दुर्व्यवहार और अपमान अस्वीकार्य है।

‘व्यवहार निंदनीय, संयम जरूरी था’
दंडी सन्यासी महासमिति के महामंत्री ईश्वरानंद तीर्थ महाराज ने कहा कि यह पूरा प्रकरण राजनीतिक प्रतीत होता है। माघमेला में अनेक संत मौजूद थे, फिर भी शंकराचार्य के साथ प्रशासन का व्यवहार निंदनीय और अस्वीकार्य है। उनके अनुसार, ऐसे अवसरों पर प्रशासन को संयम और मर्यादा बनाए रखनी चाहिए थी।

कई प्रमुख संतों की मौजूदगी
सांकेतिक उपवास में स्वामी रामदेव आश्रम, स्वामी रामखेलन आश्रम, स्वामी सर्वेश्वरानंद तीर्थ, स्वामी राघवेंद्रानंद तीर्थ, स्वामी जितेंद्रानंद तीर्थ, स्वामी राजेश्वरानंद तीर्थ, स्वामी नारायण आश्रम, स्वामी उपेंद्रानंद तीर्थ और पंडित सुनील शुक्ला सहित अनेक संत-महात्मा उपस्थित रहे।

आगे की रणनीति
संन्यासियों ने चेतावनी दी है कि यदि शासन-प्रशासन ने शीघ्र संतोषजनक कार्रवाई नहीं की, तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। फिलहाल काशी सहित अन्य धार्मिक संगठनों में भी इस घटना को लेकर नाराजगी बनी हुई है।