वाराणसी : पितृपक्ष में अजन्मी बेटियों के लिए तर्पण और पिंडदान, आगमन संस्था की पहल
वाराणसी। पितृपक्ष में जहां काशी के घाटों पर लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान कर रहे हैं, वहीं आगमन संस्था की ओर से अजन्मी बेटियों को समर्पित अनूठा आयोजन किया जाएगा। हर वर्ष की तरह इस बार भी संस्था की ओर से घाट पर विधि-विधान से अजन्मी बेटियों के नाम पिंडदान और तर्पण किया जाएगा। आयोजन के माध्यम से बेटियों के प्रति समाज में संवेदनशीलता बढ़ाने और उन्हें समान अधिकार देने का संदेश दिया जाएगा।
आयोजन में संतोष ओझा अजन्मी बेटियों के लिए पिंडदान और तर्पण करेंगे। उनका कहना है कि पितृपक्ष केवल पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर नहीं, बल्कि उन जीवनों को याद करने का भी समय है, जो दुनिया में आने से पहले ही समाप्त हो गए। इसी भावना के साथ प्रत्येक वर्ष अजन्मी बेटियों को स्मरण कर यह अनुष्ठान किया जाता है।
आगमन संस्था का कहना है कि बेटियों को लेकर समाज की सोच में सकारात्मक बदलाव लाने की आवश्यकता है। बेटियों को जन्म लेने का अधिकार मिले और परिवार व समाज में उन्हें समान सम्मान तथा अवसर प्राप्त हो, इसके लिए लगातार जागरूकता जरूरी है। संस्था के अनुसार धार्मिक परंपरा के माध्यम से सामाजिक संदेश को लोगों तक पहुंचाने का यह प्रयास इसी दिशा में एक पहल है।
पितृपक्ष में काशी के विभिन्न घाटों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण करने पहुंचते हैं। ऐसे में घाट पर आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम धार्मिक अनुष्ठान के साथ सामाजिक चेतना का संदेश भी देगा। आयोजन के दौरान अजन्मी बेटियों को श्रद्धांजलि अर्पित कर उनके प्रति सम्मान की भावना व्यक्त की जाएगी।
संतोष ओझा ने कहा कि वह प्रत्येक वर्ष पितृपक्ष में अजन्मी बेटियों के लिए पिंडदान करते हैं। यह उनके लिए केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदना से जुड़ा प्रयास है। उनका उद्देश्य लोगों को यह संदेश देना है कि बेटियों को जन्म से पहले समाप्त करने जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ जागरूकता बढ़े। बेटियों को जन्म, शिक्षा और आगे बढ़ने के समान अवसर मिलने चाहिए।
आगमन संस्था लंबे समय से सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर जागरुकता अभियान चलाती रही है। संस्था का मानना है कि धार्मिक आयोजनों के माध्यम से भी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ प्रभावी संदेश दिया जा सकता है। पितृपक्ष में अजन्मी बेटियों के लिए किया जाने वाला पिंडदान इसी प्रयास का हिस्सा है। आयोजन के जरिए लोगों से बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच अपनाने और उन्हें समान सम्मान व अधिकार देने की अपील की जाएगी।