काशी में रहने का सौभाग्य देती हैं वाराणसी देवी, काशीखंड में मिलता है महिमा का उल्लेख

बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी को केवल धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र ही नहीं, बल्कि देवी-देवताओं की जीवंत नगरी के रूप में भी जाना जाता है। यहां भगवान शिव के साथ मां शक्ति के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन्हीं में वाराणसी देवी का विशेष स्थान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति काशी में रहने की इच्छा रखता है, उसे वाराणसी देवी का दर्शन-पूजन करने से मां की कृपा प्राप्त होती है और काशी में सुखपूर्वक निवास का सौभाग्य मिलता है।
 

त्रिलोचन घाट स्थित प्राचीन मंदिर में विराजमान हैं नगर की अधिष्ठात्री शक्तिस्वरूपा देवी, श्रद्धालु करते हैं काशीवास की कामना

वरुणा और असि नदियों के बीच बसे क्षेत्र को कहा जाता है वाराणसी, त्रिलोचन मंदिर परिसर में विराजमान हैं देवी 

भगवान शिव के तीसरे नेत्र से जोड़कर देखा जाता है त्रिलोचन क्षेत्र, काशी में शिव व शक्ति की संयुक्त उपासना की परंपरा 

रिपोर्ट-ओमकार नाथ

वाराणसी। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी को केवल धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र ही नहीं, बल्कि देवी-देवताओं की जीवंत नगरी के रूप में भी जाना जाता है। यहां भगवान शिव के साथ मां शक्ति के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन्हीं में वाराणसी देवी का विशेष स्थान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति काशी में रहने की इच्छा रखता है, उसे वाराणसी देवी का दर्शन-पूजन करने से मां की कृपा प्राप्त होती है और काशी में सुखपूर्वक निवास का सौभाग्य मिलता है।

काशीखंड में मिलता है देवी की महिमा का उल्लेख
स्कंदपुराण के काशीखंड में वाराणसी देवी की महिमा का उल्लेख मिलता है। इसमें कहा गया है कि वाराणसी देवी का श्रद्धापूर्वक पूजन करने वाले व्यक्ति को देवी सुखपूर्वक निवास का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। इसी धार्मिक मान्यता के कारण काशी में रहने की इच्छा रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए वाराणसी देवी का दर्शन महत्वपूर्ण माना जाता है।

श्लोक में कहा गया है- 
“विग्रहवती पूज्या वाराणसी नरैः।
सा पूजिता प्रयत्नेन सुखवस्तिप्रदा सदा।।"


त्रिलोचन मंदिर परिसर में विराजमान हैं देवी
गायघाट के समीप गंगा तट पर स्थित प्राचीन त्रिलोचन मंदिर के परिसर में वाराणसी देवी की पौराणिक प्रतिमा स्थापित है। मुख्य मंदिर के दाहिने हिस्से में स्थित इस प्रतिमा के सामने श्रद्धालु “ॐ वाराणसी देव्यै नमः” का जाप करते हुए पूजा-अर्चना करते हैं।

मंदिर के नियमित पुजारी मोहन पांडेय के अनुसार, पत्थर की बनी वाराणसी देवी की प्रतिमा प्राचीन मानी जाती है। देवी पैरों पर खड़ी मुद्रा में विराजमान हैं। भगवान शिव को समर्पित त्रिलोचन मंदिर परिसर में स्थित यह प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है।

काशीवास की कामना से पहुंचते हैं श्रद्धालु
मान्यता है कि काशी में स्थायी रूप से रहने की इच्छा रखने वाले लोग वाराणसी देवी के दर्शन और पूजन के लिए यहां पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां की कृपा से काशी में निवास का अवसर मिलता है। स्थानीय श्रद्धालु दिनेश के अनुसार, देवी के दर्शन और पूजन से मन को शांति मिलती है और काशी में रहने की मनोकामना पूरी होने का विश्वास है।

त्रिलोचन क्षेत्र का भी है विशेष धार्मिक महत्व
वाराणसी देवी का स्थान जिस त्रिलोचन क्षेत्र में स्थित है, वह भी काशी की धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण माना जाता है। काशीखंड की मान्यताओं में त्रिलोचन मंदिर का संबंध भगवान शिव के तीसरे नेत्र से जोड़ा जाता है। त्रिलोचन घाट के बारे में यह भी मान्यता है कि यहां गंगा के साथ अदृश्य रूप से नर्मदा और पिप्पिला नदियों का संगम होता है। तीन नदियों के संगम की मान्यता के कारण इस क्षेत्र को त्रिलोचन नाम मिला।

स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, प्राचीन त्रिलोचन मंदिर को मुगलकाल में नुकसान पहुंचा था। बाद में 18वीं शताब्दी में पूना के नाथूबाला पेशवा ने इसका पुनर्निर्माण कराया। वर्ष 1965 में रामादेवी द्वारा मंदिर के पुनर्निर्माण की भी जानकारी मिलती है।

शिव और शक्ति का अभिन्न स्वरूप है काशी
काशी की धार्मिक परंपरा में शिव और शक्ति को एक-दूसरे से अलग नहीं माना जाता। मान्यता है कि जहां शिव हैं, वहां शक्ति का वास है। इसी परंपरा में वाराणसी देवी को काशी के शक्ति स्वरूप से जोड़कर देखा जाता है। विशेश्वरगंज से त्रिलोचन घाट की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित देवी का यह स्थान काशी की उस आध्यात्मिक परंपरा को दर्शाता है, जिसमें नगर को स्वयं एक जीवंत धार्मिक सत्ता के रूप में देखा जाता है।

वाराणसी नाम की व्युत्पत्ति भी इस प्राचीन नगरी की भौगोलिक पहचान से जुड़ी मानी जाती है। प्रचलित मान्यता के अनुसार वरुणा और असि नदियों के बीच बसे क्षेत्र को वाराणसी कहा गया। पुराणों में भी काशी के साथ वाराणसी नाम का उल्लेख मिलता है।

प्रसिद्ध पंक्ति में कहा गया है—
“वरणासी च नद्यौ द्वे पुण्ये पापहरे उभे।
तयोरन्तर्गता या तु सैषा वाराणसी स्मृता॥”
अर्थात वरुणा और असि दोनों पवित्र और पापों का हरण करने वाली नदियां हैं। इनके बीच स्थित क्षेत्र को वाराणसी कहा गया है।

भगवान शिव ने निर्धारित की काशी की सीमा
पूर्व विभागाध्यक्ष, ज्योतिष विभाग, बीएचयू, प्रो. विनय कुमार पांडेय के अनुसार काशी का धार्मिक महत्व उसकी भौगोलिक सीमा से भी जुड़ा है। उनके अनुसार भगवान शिव ने काशी क्षेत्र की सीमा वरुणा और असि नदियों से निर्धारित की। इसी कारण यह क्षेत्र वाराणसी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

उनके अनुसार धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में काशी को काशी, शिवपुरी, तपःस्थली, काशिका और मोक्षपुरी सहित कई नामों से जाना गया है। इनमें वाराणसी नाम भी अत्यंत प्राचीन माना जाता है।

काशीवास को माना गया है पुण्यदायी
काशी की धार्मिक परंपरा में यहां दर्शन और तीर्थाटन के साथ काशी में निवास को भी विशेष पुण्यदायी माना गया है। इसी विश्वास के चलते वाराणसी देवी की पूजा को काशीवास की कामना से जोड़ा जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां की कृपा से काशी में रहने का सौभाग्य और सुख-शांति प्राप्त होती है।

त्रिलोचन घाट स्थित वाराणसी देवी का यह प्राचीन स्थान काशी की विशाल धार्मिक परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी है। बाबा विश्वनाथ की नगरी में जहां घाट, गलियां और मंदिर अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं से जुड़े हैं, वहीं वाराणसी देवी को स्वयं काशी के देवी स्वरूप के रूप में पूजे जाने की परंपरा इस नगरी की आध्यात्मिक पहचान को और विशिष्ट बनाती है।