समय की मार : गुम हो गई ‘छोटे गुरू का, बड़े गुरू का नाग लो भाई नाग लो’ की गूंज, जानिए आखिर कौन हैं बड़े गुरू और छोटे गुरू
वाराणसी। काशी की गलियां सिर्फ रास्ते नहीं हैं। इनके अपने रंग हैं, अपनी आवाजें हैं और अपनी स्मृतियां भी। कभी इन्हीं गलियों में नागपंचमी आने से पहले एक ऐसी आवाज गूंजती थी, जिसे सुनते ही बिना कैलेंडर देखे बनारसी समझ जाते थे कि नागपंचमी आने वाली है- ‘छोटे गुरू का, बड़े गुरू का नाग लो भई नाग लो...।’
सुबह होते ही बच्चों की टोलियां हाथों में नाग देवता के रंग-बिरंगे चित्र लेकर निकल पड़ती थीं। एक गली से दूसरी गली और एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले तक उनकी हांक सुनाई देती थी। घर की चौखट पर दस्तक पड़ती, नाग देवता का चित्र खरीदा जाता और फिर वही चित्र नागपंचमी पर घर की ड्योढ़ी और दीवार पर सजता। दूध और लावा अर्पित कर नाग देवता की पूजा होती।
समय बदला। शहर बदला। बच्चों की दुनिया भी बदल गई। नागपंचमी की पूजा और परंपराएं तो काफी हद तक बची हुई हैं, लेकिन काशी की गलियों से ‘छोटे गुरु और बड़े गुरु’ की वह गूंज धीरे-धीरे गायब हो गई।
मोबाइल की स्क्रीन में सिमट गई बच्चों की दुनिया
कभी नागपंचमी के एक-दो दिन पहले ही बच्चों की टोलियां सक्रिय हो जाती थीं। उनके लिए यह केवल नाग देवता के चित्र बेचने का मौका नहीं था, बल्कि त्योहार का अपना आनंद था। दोस्त जुटते, चित्र लेकर गलियों में घूमते और पूरे उत्साह से आवाज लगाते- ‘छोटे गुरु के बड़े गुरु का नाग लो भई नाग लो।’
आज तस्वीर अलग है। बच्चों के हाथ में नाग देवता के चित्र से कहीं ज्यादा मोबाइल दिखाई देता है। खेल का मैदान हो या घर का आंगन, सोशल मीडिया, रील्स और ऑनलाइन गेम ने खाली समय के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है। इसका असर ऐसी लोक परंपराओं पर भी पड़ा है, जो कभी बच्चों के जरिए ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती थीं।
नाग देवता के चित्र बेचते बच्चे आज भी कहीं-कहीं दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी संख्या बेहद कम हो गई है। उससे भी दिलचस्प बात यह है कि इनमें से बहुत से बच्चों को उस पुरानी हांक के बारे में पता ही नहीं।
गोलू, सोनू, मोनू, मनीष, दिवाकर और चंदू जैसे बच्चों से जब पूछा गया कि क्या उन्होंने कभी ‘छोटे गुरु के बड़े गुरु का नाग लो भई नाग लो’ सुना है तो जवाब चौंकाने वाला था। बच्चों का कहना था— “हमने तो यह आवाज कभी सुनी ही नहीं। किसी ने इसके बारे में बताया भी नहीं। अंकल, आप बता रहे हैं तो अब जान रहे हैं।”
यानी जिस परंपरा को कभी बच्चों की टोलियां जीवंत रखती थीं, अब उन्हीं बच्चों के लिए वह अनजानी कहानी बनती जा रही है।
आखिर कौन हैं ‘छोटे गुरु’ और ‘बड़े गुरु’?
इस हांक के पीछे केवल बच्चों की शरारत या नाग देवता का चित्र बेचने की तरकीब नहीं, बल्कि ज्ञान और गुरु परंपरा से जुड़ा एक रोचक संदर्भ भी बताया जाता है।
लोकमान्यता में अष्टाध्यायी के रचयिता महर्षि पाणिनि को ‘बड़े गुरु’ और अष्टाध्यायी पर महाभाष्य लिखने वाले महर्षि पतंजलि को ‘छोटे गुरु’ के रूप में इस परंपरा से जोड़ा जाता रहा है। समय के साथ हांक तो पीढ़ियों तक पहुंचती रही, लेकिन उसके पीछे की कहानी नई पीढ़ी तक नहीं पहुंच सकी।
यही वजह है कि आज बहुत से युवाओं से ‘छोटे गुरु-बड़े गुरु’ के बारे में पूछने पर जवाब काशी के अपने अलमस्त अंदाज में मिलता है।
‘बनारस में कौन गुरु नहीं है?’
सोनल, प्रीतम, वीरेंद्र, सुमित, अमित और नीरज जैसे कुछ युवाओं से जब ‘छोटे गुरु-बड़े गुरु’ का मतलब पूछा गया तो उनके जवाब में बनारसी मिजाज साफ दिखाई दिया।
उनका कहना था- “काशी तो खुद पूरी दुनिया की गुरु है। यहां हर आदमी गुरु है। उम्र में छोटा है तो छोटा गुरु और बड़ा है तो बड़ा गुरु!”
बात यहीं खत्म नहीं होती। युवाओं का अपना तर्क है कि यह शायद देश का ऐसा जीवंत शहर है, जहां किसी अनजान व्यक्ति को भी ‘गुरु’ कहकर पुकार दिया जाता है। पान का बीड़ा मुंह में दबाकर जिंदगी की तमाम उलझनों के बीच अलमस्त रहने का हुनर बनारस की पहचान है। इसलिए उनके लिए ‘छोटे गुरु-बड़े गुरु’ का अर्थ भी इसी बनारसी ‘गुरुवाद’ में छिपा हुआ है।
उनके इस तर्क में बनारस का मिजाज जरूर है, लेकिन उस पुरानी परंपरा की असली कहानी उनसे कहीं पीछे छूट चुकी है।
तस्वीर बिक रही है, पर आवाज खो गई
नागपंचमी पर घरों में नाग देवता के चित्र आज भी लगाए जाएंगे। दूध और लावा भी चढ़ेगा। मंदिरों में श्रद्धालु उमड़ेंगे और नाग देवता की पूजा होगी। यानी आस्था अपनी जगह कायम है।
मगर त्योहारों से जुड़ी वे छोटी-छोटी लोक परंपराएं, जो किसी शहर की सांस्कृतिक पहचान को खास बनाती हैं, तेजी से कमजोर हो रही हैं।
नाग देवता का चित्र आज भी बाजार में है, लेकिन उसे बेचने वाली वह आवाज बाजार से गायब है।
शायद यही समय की सबसे बड़ी मार है। पहले परंपरा किताबों से नहीं, घर और मोहल्ले से सीखी जाती थी। दादा-दादी और माता-पिता से बच्चों तक पहुंचती थी। बच्चे उसे खेल-खेल में आगे बढ़ाते थे। आज सूचना का संसार पहले से हजार गुना बड़ा है, लेकिन अपने ही शहर की कई छोटी-छोटी सांस्कृतिक स्मृतियों से नई पीढ़ी अनजान होती जा रही है।
काशी आज भी गुरु है, काशीवासी आज भी एक-दूसरे को ‘गुरु’ कहते हैं और नागपंचमी भी उसी श्रद्धा से मनाई जाती है। बस वक्त की तेज रफ्तार में कहीं पीछे छूट गई है वह मासूम आवाज—
‘छोटे गुरु के बड़े गुरु का नाग लो भई नाग लो...।’
और शायद आने वाली पीढ़ी के लिए यह आवाज किसी गली की जीवंत परंपरा नहीं, सिर्फ पुराने बनारस की सुनाई जाने वाली कहानी बनकर रह जाए।