काशी में बन रही देश की दूसरी सबसे ऊंची मां सरस्वती की प्रतिमा, दिव्यांग खिलाड़ियों की विश्वकप जीत को समर्पित है विशेष आकृति

धार्मिक नगरी काशी एक बार फिर भव्यता और कला कौशल का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करने जा रही है। यहां देश की दूसरी सबसे बड़ी और उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी मां सरस्वती की प्रतिमा का निर्माण किया जा रहा है। इस वर्ष बनने वाली प्रतिमा पिछले वर्ष की तुलना में आठ फीट अधिक ऊंची होगी। जहां दूसरी सबसे बड़ी प्रतिमा की ऊंचाई 53 फीट रखी गई है, वहीं तीसरे स्थान पर आने वाली प्रतिमा 46 फीट ऊंची होगी।
 

53 फीट ऊंची प्रतिमा सोने-चांदी के लुक में, भारत की महारानी के रूप में होगी स्थापित

मोबाइल से दूर, किताबों की ओर लौटने का संदेश देती मां सरस्वती की प्रतिमा भी बनेगी आकर्षण का केंद्र

रिपोर्टर : ओमकारनाथ


वाराणसी। धार्मिक नगरी काशी एक बार फिर भव्यता और कला कौशल का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करने जा रही है। यहां देश की दूसरी सबसे बड़ी और उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी मां सरस्वती की प्रतिमा का निर्माण किया जा रहा है। इस वर्ष बनने वाली प्रतिमा पिछले वर्ष की तुलना में आठ फीट अधिक ऊंची होगी। जहां दूसरी सबसे बड़ी प्रतिमा की ऊंचाई 53 फीट रखी गई है, वहीं तीसरे स्थान पर आने वाली प्रतिमा 46 फीट ऊंची होगी।

दोनों प्रतिमाओं का निर्माण पिछले लगभग दो महीनों से खोजवां क्षेत्र स्थित मूर्ति कारखाने में चल रहा है और इन्हें 23 जनवरी को सरस्वती पूजा से पहले पूर्ण रूप से तैयार कर लिया जाएगा। इन प्रतिमाओं को सोने और चांदी के आकर्षक लुक में सजाया जाएगा, जिससे वे दूर से ही श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर खींचेंगी।

भारत की महारानी के स्वरूप में मां सरस्वती
53 फीट ऊंची प्रतिमा को विशेष रूप से मां दुर्गा, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती के संयुक्त रूप में “भारत की महारानी” की थीम पर तैयार किया जा रहा है। इस प्रतिमा के साथ दो विशाल शेर भी बनाए जा रहे हैं, जिनकी ऊंचाई लगभग आठ-आठ फीट होगी। मां के सिर पर आठ से नौ फीट ऊंचा मुकुट लगाया जाएगा, जबकि उनकी वीणा लगभग सात फीट लंबी होगी। प्रतिमा की कुल चौड़ाई करीब 15 फीट होगी।

यह भव्य प्रतिमा चेतगंज दलहट्टा स्थित आर्यावर्त स्पोर्टिंग क्लब के पूजा पंडाल में स्थापित की जाएगी। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष भी इसी स्थान पर देश की दूसरी सबसे बड़ी 45 फीट ऊंची मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित की गई थी, जिसे देखने के लिए हजारों श्रद्धालु पहुंचे थे।

46 फीट की प्रतिमा हंस पर विराजमान
दूसरी बड़ी प्रतिमा, जिसकी ऊंचाई 46 फीट होगी, कृत्रिम सोने के रंग में सजी-धजी होगी। इस प्रतिमा में मां सरस्वती विशाल 12 फीट ऊंचे हंस पर विराजमान रहेंगी। उनके चार हाथ होंगे। एक हाथ हंस की गर्दन पर, दूसरे में कमल, तीसरे में फूल और चौथे में सितार होगा।

इस प्रतिमा को सोनिया गुजराती गली स्थित न्यू एकता क्लब के पूजा पंडाल में स्थापित किया जाएगा। दोनों प्रतिमाएं न केवल उत्तर प्रदेश की अब तक की सबसे बड़ी सरस्वती प्रतिमाएं होंगी, बल्कि देशभर में भी इनका विशेष स्थान रहेगा।

बंगाल के कारीगरों की मेहनत
इन प्रतिमाओं के निर्माण में काशी के साथ-साथ पश्चिम बंगाल से आए 14 कुशल कारीगर जुटे हुए हैं। प्रख्यात मूर्तिकार अभिजीत विश्वास ने बताया कि दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा पर बड़ी प्रतिमाओं का चलन बंगाल के बाद अब काशी में भी तेजी से बढ़ा है। पिछले तीन वर्षों में पूजा पंडालों में विशाल प्रतिमाओं की मांग दोगुनी हो गई है।

उन्होंने बताया कि इस वर्ष करीब 27 बड़ी प्रतिमाएं बनाई जा रही हैं, जिनकी ऊंचाई 30 से 53 फीट के बीच है। सभी प्रतिमाएं बैठी हुई मुद्रा में होंगी। इसके अलावा, इन कारखानों में 100 से अधिक छोटी-बड़ी प्रतिमाएं भी तैयार की जा रही हैं, जिन्हें पूरे पूर्वांचल के विभिन्न जिलों में भेजा जाएगा।

सोने-चांदी का भव्य श्रृंगार
प्रतिमाओं के श्रृंगार के लिए विशेष सामग्री बंगाल से मंगाई गई है। मां के वस्त्र, आभूषण और अन्य सजावटी सामग्री कृत्रिम चांदी और सोने से तैयार की जा रही हैं, ताकि भव्यता और दिव्यता दोनों का समन्वय दिख सके। श्रृंगार पर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, जिससे प्रतिमा को राजसी स्वरूप दिया जा सके।

एक और विशाल प्रतिमा कश्मीरीगंज खोजवां में
इसके अलावा कश्मीरीगंज खोजवां क्षेत्र में 42 फीट ऊंची एक और मां सरस्वती की प्रतिमा का निर्माण किया जा रहा है, जो उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी प्रतिमाओं में शामिल होगी। इसे बंगाली कारीगर अभिजीत विश्वास और राजेंद्र पाल सहित 14 कारीगर बना रहे हैं। यह प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में होगी और इसका श्रृंगार प्रसिद्ध नवरदीप धाम की तर्ज पर किया जा रहा है, जिस पर लगभग तीन लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है।

विश्व रिकॉर्ड की चर्चा
मूर्ति निर्माण से जुड़े कारीगरों के अनुसार, वर्तमान में विश्व की सबसे बड़ी सरस्वती प्रतिमा पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में 51 फीट ऊंची बनाई जा रही है, जबकि इससे पहले महेशतला में 111 फीट ऊंची प्रतिमा बनाकर रिकॉर्ड बनाया जा चुका है। काशी में बन रही 53 फीट ऊंची प्रतिमा देश में दूसरे स्थान पर होगी।

AI थीम भी बनी आकर्षण
इस वर्ष कुछ प्रतिमाओं में आधुनिक तकनीक और “AI थीम” का भी प्रयोग किया जा रहा है, जिसमें मां दुर्गा और अन्य देवियों के रूपों की झलक भी देखने को मिलेगी। एक प्रतिमा को तैयार करने में करीब 45 दिन का समय लग रहा है।

काशी में बन रही ये भव्य प्रतिमाएं न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक होंगी, बल्कि कला, तकनीक और परंपरा के संगम का भी जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करेंगी। सरस्वती पूजा के अवसर पर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए यह एक बड़ा आकर्षण बनने जा रहा 

प्रख्यात मूर्तिकार अभिजीत विश्वास ने बताया कि इस बार प्रतिमाओं और आकृतियों में केवल धार्मिक भावनाओं ही नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने वाले विषयों को भी प्रमुखता दी गई है। उन्होंने कहा कि हाल ही में भारत की दिव्यांग महिला खिलाड़ियों ने विश्व कप जीतकर देश का नाम रोशन किया है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि से प्रेरित होकर कलाकारों की टीम ने एक विशेष आकृति तैयार की है, जिसमें विश्व कप ट्रॉफी के साथ खिलाड़ियों का चित्र उकेरा गया है। यह आकृति दिव्यांग खिलाड़ियों के आत्मविश्वास, संघर्ष और सफलता का प्रतीक होगी और दर्शकों को प्रेरणा देने का कार्य करेगी।

अभिजीत विश्वास के अनुसार, “हमारी दिव्यांग बहनों ने विश्व कप जीतकर यह साबित कर दिया है कि अगर हौसला मजबूत हो तो कोई भी बाधा रास्ता नहीं रोक सकती। उनकी इस उपलब्धि को सम्मान देने के लिए हमने अपनी कला के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि देने का प्रयास किया है।”


मोबाइल संस्कृति पर प्रहार, किताबों की ओर लौटने का संदेश
उन्होंने यह भी बताया कि एक अन्य आकृति मां सरस्वती को विचार मुद्रा में दर्शाते हुए बनाई जा रही है। इस प्रतिमा के माध्यम से बच्चों और युवाओं को एक गहरा संदेश देने का प्रयास किया गया है।

अभिजीत विश्वास ने कहा कि आज के समय में बच्चे और युवा किताबों से दूर होते जा रहे हैं और मोबाइल फोन पर अत्यधिक समय बिता रहे हैं, जिससे उनका ध्यान पढ़ाई और रचनात्मक गतिविधियों से भटक रहा है। इसी सामाजिक सच्चाई को ध्यान में रखते हुए मां सरस्वती की यह आकृति तैयार की गई है, जिसमें वे चिंतन करती हुई दिखाई देंगी।

इस मूर्ति के माध्यम से यह दिखाया जाएगा कि ज्ञान की देवी स्वयं इस बात पर विचार कर रही हैं कि नई पीढ़ी किस दिशा में जा रही है। कलाकारों का उद्देश्य है कि इस दृश्य को देखकर अभिभावक, शिक्षक और छात्र सभी आत्ममंथन करें और फिर से पुस्तकों व अध्ययन की ओर लौटने की प्रेरणा लें।


कला के माध्यम से समाज को संदेश
मूर्तिकार अभिजीत विश्वास का कहना है कि आज मूर्तिकला केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह समाज को दिशा देने का सशक्त माध्यम भी बन चुकी है। उन्होंने बताया कि पूजा पंडालों में आने वाली हजारों की भीड़ इन कलाकृतियों को देखती है और यदि उनके माध्यम से कोई सकारात्मक संदेश लोगों तक पहुंचे, तो कलाकार का उद्देश्य सफल हो जाता है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष की प्रतिमाएं और आकृतियां न केवल अपनी ऊंचाई और भव्यता के कारण चर्चा में रहेंगी, बल्कि उनमें छिपे सामाजिक संदेशों के कारण भी लोगों को लंबे समय तक याद रहेंगी।

श्रद्धालुओं के लिए होगा विशेष आकर्षण
सरस्वती पूजा के अवसर पर जब ये प्रतिमाएं और विशेष आकृतियां पंडालों में स्थापित होंगी, तब दिव्यांग खिलाड़ियों को समर्पित विश्व कप थीम और किताबों की ओर लौटने का संदेश देती मां सरस्वती की विचार मुद्रा निश्चित रूप से श्रद्धालुओं और दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बनेगी।

आयोजकों को उम्मीद है कि इन कलाकृतियों के माध्यम से जहां एक ओर देश की बेटियों की ऐतिहासिक उपलब्धि को सम्मान मिलेगा, वहीं दूसरी ओर समाज को शिक्षा और ज्ञान के महत्व का स्मरण भी कराया जा सकेगा।