चंद्रप्रभा की सुरम्य वादियों में बह रही कजरी की सुरधार, पद्मश्री मालिनी अवस्थी सिखा रहीं लोकसंगीत की अनमोल विरासत
'रिमझिम बरसे बदरिया' कार्यशाला में देश-विदेश के युवा कलाकार ले रहे प्रशिक्षण, गंगोत्री क्रूज़ पर गुरु-शिष्य परंपरा के साथ होगा भव्य समापन
'सोनचिरैया' संस्था के 15 वर्ष पूर्ण होने पर पांच दिवसीय कजरी कार्यशाला का आयोजन, 25 से 29 जुलाई तक राजदरी रिजॉर्ट और गंगोत्री क्रूज़ पर चल रहा प्रशिक्षण
पद्मश्री मालिनी अवस्थी के मार्गदर्शन में कजरी, झूला, चैती, दादरा और ठुमरी की बारीकियां सीख रहे प्रतिभागी
देश के विभिन्न राज्यों के साथ विदेशों से भी पहुंचे लोकसंगीत प्रेमी, गुरु पूर्णिमा पर मां गंगा के सानिध्य में गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष आयोजन
रिपोर्ट- ओमकार नाथ
वाराणसी। भारतीय लोककला और लोकसंगीत के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से कार्यरत संस्था 'सोनचिरैया' अपने स्वर्णिम 15 वर्ष पूरे होने के अवसर पर पांच दिवसीय कजरी कार्यशाला "रिमझिम बरसे बदरिया" का आयोजन कर रही है। 25 से 29 जुलाई 2026 तक चलने वाली इस कार्यशाला का आयोजन सूर्या रोशनी लिमिटेड तथा नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) के सहयोग से किया जा रहा है। काशी की सांस्कृतिक पहचान और सावन की लोक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का यह प्रयास संगीत प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
कार्यशाला की शुरुआत चंद्रप्रभा वन्यजीव अभयारण्य स्थित प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर राजदरी रिजॉर्ट में हुई, जहां प्रतिभागियों ने प्रकृति के बीच लोकसंगीत की साधना की। इसके बाद प्रशिक्षण का दूसरा चरण मां गंगा की पावन धारा में संचालित गंगोत्री क्रूज़ पर आयोजित किया जा रहा है। गंगा की लहरों, सावन की फुहारों और कजरी की मधुर स्वर लहरियों ने पूरे वातावरण को लोकसंगीत के रंग में रंग दिया है।
इस कार्यशाला का संचालन देश की सुप्रसिद्ध लोकगायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी की देखरेख में किया जा रहा है। उनके मार्गदर्शन में प्रतिभागियों को पूर्वांचल और अवध की समृद्ध लोकगायन परंपरा से परिचित कराया जा रहा है। कजरी के साथ-साथ झूला, चैती, दादरा और ठुमरी जैसी पारंपरिक गायन विधाओं की रागात्मक संरचना, लय, भाव, बंदिश और प्रस्तुति शैली का अभ्यास कराया जा रहा है, ताकि युवा कलाकार भारतीय लोकसंगीत की मूल आत्मा को समझ सकें।
कार्यशाला की एक विशेष उपलब्धि यह भी है कि इसमें भारत के विभिन्न राज्यों के अलावा विदेशों से भी बच्चे, युवा कलाकार और संगीत साधक भाग ले रहे हैं। अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों से जुड़े प्रतिभागी काशी में एक साथ लोकसंगीत का प्रशिक्षण लेकर सांस्कृतिक एकता और भारतीय परंपरा का संदेश दे रहे हैं। इस वर्ष का आयोजन इसलिए भी खास है क्योंकि पहली बार पद्मश्री मालिनी अवस्थी अपने शिष्यों के साथ काशी में गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाएंगी। मां गंगा के तट पर गुरु-शिष्य परंपरा का यह आयोजन प्रतिभागियों के लिए आजीवन यादगार अनुभव बनने जा रहा है।
29 जुलाई को गंगोत्री क्रूज़ पर आयोजित होने वाली विशेष सांगीतिक संध्या के साथ कार्यशाला का समापन होगा। इस अवसर पर प्रतिभागी कजरी, झूला, दादरा और ठुमरी की प्रस्तुतियां देंगे। पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने कहा कि लोकसंगीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और मिट्टी की आत्मा है। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्यशालाएं नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रही हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि काशी की यह पहल भारतीय लोकसंगीत को राष्ट्रीय ही नहीं, वैश्विक स्तर पर भी नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।