अविमुक्तेश्वरानंद पर संत समिति का सबसे बड़ा हमला! शंकराचार्य मानने से इनकार, लगाए गंभीर आरोप

अखिल भारतीय संत समिति ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य मानने से इनकार करते हुए उन पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। काशी में आयोजित प्रेस वार्ता में समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेन्द्रनंद सरस्वती ने कहा कि संत समिति स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को न तो शंकराचार्य मानती है और न ही उन्हें संन्यासी स्वीकार करती है। उन्होंने दावा किया कि देश के अनेक प्रमुख संतों ने भी उनका बहिष्कार किया हुआ है।
 

वाराणसी। अखिल भारतीय संत समिति ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य मानने से इनकार करते हुए उन पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। काशी में आयोजित प्रेस वार्ता में समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेन्द्रनंद सरस्वती ने कहा कि संत समिति स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को न तो शंकराचार्य मानती है और न ही उन्हें संन्यासी स्वीकार करती है। उन्होंने दावा किया कि देश के अनेक प्रमुख संतों ने भी उनका बहिष्कार किया हुआ है।

प्रेस वार्ता में लगाए कई गंभीर आरोप
स्वामी जितेन्द्रनंद सरस्वती ने प्रेस वार्ता के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर तीखे आरोप लगाए। उन्होंने उन्हें जॉर्ज सोरोस का एजेंट और मुगलों का दलाल बताया। साथ ही कहा कि उनका राजनीतिक आचरण किसी विशेष दल के समर्थन जैसा दिखाई देता है। उन्होंने आरोप लगाया कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद समाजवादी पार्टी के पक्ष में कार्य करने जैसा व्यवहार कर रहे हैं।

'संत समिति उन्हें संन्यासी नहीं मानती'
राष्ट्रीय महामंत्री ने कहा कि अखिल भारतीय संत समिति स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को संन्यासी के रूप में भी स्वीकार नहीं करती। उनका कहना था कि देश के कई बड़े संतों ने भी उनसे दूरी बना रखी है और उनका बहिष्कार किया हुआ है।

रामालय ट्रस्ट को लेकर भी उठाए सवाल
प्रेस वार्ता के दौरान स्वामी जितेन्द्रनंद सरस्वती ने रामालय ट्रस्ट का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि रामालय ट्रस्ट के माध्यम से राम मंदिर के नाम पर देशभर से सोना एकत्र किया गया था। उनका आरोप है कि इस सोने का सार्वजनिक रूप से हिसाब देश के सामने रखा जाना चाहिए। उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से इस संबंध में जवाब देने की मांग की।

संत समाज में बहस तेज होने के संकेत
प्रेस वार्ता में दिए गए इन बयानों के बाद संत समाज के भीतर यह मुद्दा और अधिक चर्चा का विषय बन गया है। अखिल भारतीय संत समिति ने स्पष्ट किया कि वह अपने रुख पर कायम है और आगे भी इस विषय को सार्वजनिक रूप से उठाती रहेगी।