सनातन रक्षा के लिए ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी’ का गठन, चार स्तंभों पर आधारित होगा संगठन

सनातन धर्म के प्रतीकों गौमाता, ब्राह्मणों और समाज के निर्बल वर्गों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ने ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी’ (शं.च.) नामक नए संगठन के गठन की घोषणा की है। इस पहल का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को संरक्षण देना और सनातन धर्म के अनुयायियों में आत्मविश्वास एवं निर्भयता का संचार करना है।
 

वाराणसी। सनातन धर्म के प्रतीकों गौमाता, ब्राह्मणों और समाज के निर्बल वर्गों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती ने ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी’ (शं.च.) नामक नए संगठन के गठन की घोषणा की है। इस पहल का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को संरक्षण देना और सनातन धर्म के अनुयायियों में आत्मविश्वास एवं निर्भयता का संचार करना है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि वर्तमान समय में धर्म और उसके प्रतीकों पर हो रहे आघात को देखते हुए केवल शास्त्रों की चर्चा पर्याप्त नहीं है, बल्कि संगठित और व्यवस्थित प्रयासों की आवश्यकता है। उन्होंने भगवान परशुराम के संकल्प का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज की रक्षा के लिए शास्त्र और शस्त्र दोनों का संतुलित उपयोग आवश्यक है।

उन्होंने बताया कि ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी’ प्रत्येक सनातनी के लिए एक अभिभावक की भूमिका निभाएगी। संगठन का लक्ष्य समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों को सहारा देना है, ताकि वे बिना भय के अपने धर्म और अधिकारों की रक्षा कर सकें। इसके माध्यम से जरूरतमंदों को सहयोग, सुरक्षा और मार्गदर्शन प्रदान किया जाएगा।

संगठन की संरचना प्राचीन भारतीय सैन्य परंपरा से प्रेरित होगी। इसमें नौ स्तरीय पदानुक्रम तय किया गया है, जिसमें पतिपाल, सेनामुखपति, गुल्मपति, गणपाल, वाहिनीपति, पृतनापति, चमुपति, अनीकिनीपति और महासेनापति जैसे पद शामिल होंगे। शीर्ष स्तर पर परमाध्यक्ष के नेतृत्व में सर्वाध्यक्ष, सह-सर्वाध्यक्ष और संयुक्त सर्वाध्यक्ष कार्य करेंगे, जिनमें पुरुष, महिला और तृतीय लिंग प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया जाएगा।

‘शंकराचार्य चतुरंगिणी’ को चार प्रमुख अंगों मनबल, तनबल, धनबल और जनबल में विभाजित किया गया है। इन चारों स्तंभों के माध्यम से संगठन बहुआयामी कार्य करेगा। मनबल के अंतर्गत संत, विद्वान, पुरोहित, वकील और मीडिया से जुड़े लोग वैचारिक और बौद्धिक दिशा प्रदान करेंगे।
तनबल में मल्ल, लाठी, परशु, खड्ग और शस्त्र संचालन से जुड़े सदस्य सुरक्षा और रक्षा से संबंधित कार्य संभालेंगे।

जनबल में विभिन्न स्तरों के स्वयंसेवक सार्वकालिक से लेकर दैनिक सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाएंगे। वहीं धनबल के अंतर्गत दानदाताओं, भूमि, भवन और अन्य संसाधनों के माध्यम से संगठन को मजबूत आधार दिया जाएगा। घोषणा के साथ ही संगठन में शामिल होने के लिए पंजीकरण प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। इसकी सबसे छोटी इकाई ‘पत्ति’ होगी, जिसमें 10 सदस्य शामिल होंगे और उसका नेतृत्व पतिपाल करेगा।