वाराणसी में इतिहास लेखन की दिशा और पद्धति पर वरिष्ठ इतिहासकारों ने किया मंथन
वाराणसी। भारतीय इतिहास संकलन समिति, काशी प्रान्त, उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में रविवार को पार्श्वनाथ विद्यापीठ, करौंदी स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के सभागार में ‘इतिहास प्रयोजन : अध्ययन, अनुसंधान और लेखन के संदर्भ में’ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। चार सत्रों में हुई कार्यशाला में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए वरिष्ठ इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और विद्वानों ने इतिहास के अध्ययन, अनुसंधान एवं लेखन की वर्तमान चुनौतियों पर गंभीर विचार-विमर्श किया।
कार्यशाला की संयोजिका प्रो. अनुराधा सिंह ने कहा कि वरिष्ठ इतिहासकारों और विद्वानों के अनुभव तथा चिंतन को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से आयोजित यह कार्यशाला इतिहास लेखन की दिशा में महत्वपूर्ण संवाद का माध्यम बनी। उद्घाटन सत्र में दीप प्रज्वलन और बाबा साहब आप्टे के चित्र पर पुष्पार्चन के बाद प्रो. पीयूष कान्त शर्मा ने संगठन मंत्र एवं सामूहिक गीत प्रस्तुत किया।
प्रो. प्रवेश भारद्वाज ने विषय प्रवर्तन करते हुए कार्यशाला के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। मुख्य वक्ता बालमुकुन्द पाण्डेय ने इतिहास लेखन की चुनौतियों पर चर्चा करते हुए निष्पक्ष और राष्ट्रीय दृष्टि अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती इतिहासकारों के कार्यों से प्रेरणा लेते हुए मूल स्रोतों का अध्ययन किया जाना चाहिए और उपलब्ध तथ्यों का प्रमाणिक स्रोतों से मिलान जरूरी है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और वैदिक साहित्य के महत्व को भी रेखांकित किया।
प्रो. देवी प्रसाद सिंह ने कहा कि इतिहास संकलन से जुड़े कार्यकर्ताओं में उच्च चरित्र, त्याग, शील, निष्ठा और निरंतर कर्मठता जैसे गुण आवश्यक हैं। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. आनन्द शंकर सिंह ने कहा कि इतिहास अध्ययन का उद्देश्य केवल सूचनाओं और आंकड़ों का संचय नहीं, बल्कि सूक्ष्म ऐतिहासिक चेतना का निर्माण होना चाहिए।
द्वितीय शैक्षणिक सत्र में प्रो. रचना सिंह ने कृषि, उद्योग और व्यापार को राष्ट्र की समृद्धि के प्रमुख आधार बताते हुए प्राचीन भारत की आर्थिक उन्नति पर चर्चा की। प्रो. संतोष कुमार ने शोध में प्रमाणिक स्रोतों और गंभीर अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया। सत्र की अध्यक्षता प्रो. सुमन जैन ने की। तृतीय सत्र में विभिन्न जनपदीय मंत्रियों द्वारा वृत्त निवेदन के बाद मुक्तचिंतन हुआ। प्रो. सारिका सिंह और प्रो. ऋतु जायसवाल ने इतिहास लेखन की दिशा और समकालीन चुनौतियों पर विचार रखे। अध्यक्षता प्रो. राघवेन्द्र कुमार सिंह ने की।
सम्पूर्ति सत्र में प्रो. रजनीश शुक्ल ने कार्यशाला को उद्देश्यपूर्ण बताते हुए कहा कि इतिहास के अध्ययन, अनुसंधान और लेखन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर स्वतंत्र एवं व्यापक चर्चा हुई। प्रो. ओ.एन. सिंह ने सत्र की अध्यक्षता की। कार्यशाला में भारतीय दृष्टि, प्राथमिक एवं प्रमाणिक स्रोतों, तथ्यपरकता और वैज्ञानिक शोध पद्धति के साथ इतिहास लेखन को आगे बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। प्रो. आद्याप्रसाद पाण्डेय, डॉ. अभिजित दीक्षित, डॉ. शोभनाथ पाठक, डॉ. अशोक कुमार सिंह समेत अनेक विद्वान उपस्थित रहे।