बीएचयू संविदा कर्मियों को राहत : हाईकोर्ट ने तीन माह में नियमितीकरण पर फैसला लेने का दिया निर्देश, लापरवाही पर जुर्माना

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बीएचयू के संविदा पर कार्यरत गैर-शिक्षण कर्मचारियों के मामले में अहम आदेश जारी किया है। न्यायालय ने विश्वविद्यालय प्रशासन को निर्देश दिया है कि वर्षों से कार्यरत कर्मचारियों के नियमितीकरण के मुद्दे पर तीन महीने के भीतर अंतिम निर्णय लिया जाए। साथ ही, सुनवाई के दौरान लापरवाही बरतने पर विश्वविद्यालय पर आर्थिक दंड भी लगाया गया है।
 

वाराणसी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बीएचयू के संविदा पर कार्यरत गैर-शिक्षण कर्मचारियों के मामले में अहम आदेश जारी किया है। न्यायालय ने विश्वविद्यालय प्रशासन को निर्देश दिया है कि वर्षों से कार्यरत कर्मचारियों के नियमितीकरण के मुद्दे पर तीन महीने के भीतर अंतिम निर्णय लिया जाए। साथ ही, सुनवाई के दौरान लापरवाही बरतने पर विश्वविद्यालय पर आर्थिक दंड भी लगाया गया है।

यह आदेश न्यायमूर्ति दिनेश पाठक की एकल पीठ द्वारा रिट याचिका संख्या 18901/2024 के निस्तारण के दौरान दिया गया। याचिका अनूप कुमार समेत 39 कर्मचारियों की ओर से दायर की गई थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि वे वर्ष 2013-14 से बीएचयू में ऑफिस असिस्टेंट और ऑडिट असिस्टेंट जैसे पदों पर लगातार सेवाएं दे रहे हैं। इतने लंबे समय तक कार्य करने के बावजूद उनके नियमितीकरण पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, जिससे वे अस्थिर सेवा स्थिति में काम करने को मजबूर हैं।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर नाराजगी भी जताई। अदालत ने पाया कि बीएचयू की ओर से समय पर जवाब दाखिल नहीं किया गया और बार-बार समय मांगा गया। इस पर पहले की सुनवाई में न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने कड़ा रुख अपनाते हुए विश्वविद्यालय पर ₹2,000 का हर्जाना लगाया था। यह राशि ‘हाई कोर्ट बार एसोसिएशन, इलाहाबाद’ में जमा करने का निर्देश दिया गया।

न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि सभी याचिकाकर्ता एक सप्ताह के भीतर कुलपति के समक्ष नया प्रत्यावेदन प्रस्तुत करें। इसके बाद कुलपति को तीन महीने की निश्चित समय-सीमा के भीतर इस पूरे मामले पर निर्णय लेना होगा। अदालत ने यह भी कहा कि हाल ही में विश्वविद्यालय द्वारा जारी विज्ञापन संख्या 07/2024-2025 के तहत होने वाली नई नियुक्तियां, इस मामले में लिए जाने वाले निर्णय के अधीन रहेंगी।

इस फैसले के बाद बीएचयू प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है कि वह लंबे समय से कार्यरत संविदा कर्मचारियों के भविष्य को लेकर स्पष्ट और न्यायसंगत निर्णय ले। कर्मचारियों के लिए यह आदेश राहत भरा माना जा रहा है, क्योंकि अब उनके नियमितीकरण की प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है।