गंगा की सफाई के प्रहरी बन रहे दुर्लभ कछुए, वाराणसी पुनर्वास केंद्र में 8 प्रजातियों का संरक्षण

गंगा नदी के पारिस्थितिक संतुलन और स्वच्छता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दुर्लभ प्रजाति के कछुओं के संरक्षण के लिए वाराणसी का कछुआ पुनर्वास केंद्र लगातार सराहनीय कार्य कर रहा है। वन विभाग की देखरेख में संचालित इस केंद्र में न केवल संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण किया जा रहा है, बल्कि उनके प्रजनन के माध्यम से उनकी संख्या भी बढ़ाई जा रही है। बड़े होने के बाद इन कछुओं को गंगा सहित विभिन्न नदियों में छोड़ा जाता है, जिससे प्राकृतिक जैव विविधता को मजबूती मिल रही है।
 

वाराणसी। गंगा नदी के पारिस्थितिक संतुलन और स्वच्छता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दुर्लभ प्रजाति के कछुओं के संरक्षण के लिए वाराणसी का कछुआ पुनर्वास केंद्र लगातार सराहनीय कार्य कर रहा है। वन विभाग की देखरेख में संचालित इस केंद्र में न केवल संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण किया जा रहा है, बल्कि उनके प्रजनन के माध्यम से उनकी संख्या भी बढ़ाई जा रही है। बड़े होने के बाद इन कछुओं को गंगा सहित विभिन्न नदियों में छोड़ा जाता है, जिससे प्राकृतिक जैव विविधता को मजबूती मिल रही है।

चंबल और इटावा से लाए गए अंडे
वन विभाग के अनुसार, वाराणसी स्थित इस केंद्र में 7 से 8 दुर्लभ प्रजातियों के कछुओं का संरक्षण किया जा रहा है। इसके लिए आगरा के चंबल क्षेत्र और इटावा से कछुओं के अंडे लाकर विशेष हैचिंग यूनिट में सुरक्षित रखा जाता है। अंडों से बच्चे निकलने के बाद उन्हें अलग-अलग तालाबों (पॉन्ड) में रखा जाता है, जहां उनकी नियमित निगरानी और देखभाल की जाती है। जब कछुए पर्याप्त बड़े हो जाते हैं, तब उन्हें गंगा और अन्य नदियों में प्राकृतिक आवास के लिए छोड़ दिया जाता है।

प्रजनन केंद्र में 2000 से 3000 कछुओं को रखने की व्यवस्था
वन संरक्षक रवि कुमार ने बताया कि वाराणसी का कछुआ प्रजनन केंद्र वर्षों से संरक्षण का कार्य कर रहा है। केंद्र में एक समय में लगभग 2,000 से 3,000 कछुओं को रखने की क्षमता है। इसी क्षमता के अनुरूप हर वर्ष अंडों का चयन कर उन्हें चंबल से लाया जाता है, ताकि दुर्लभ प्रजातियों की संख्या लगातार बढ़ाई जा सके। उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में जहां कई क्षेत्रों में कछुओं की संख्या घट रही है, वहीं वाराणसी का यह केंद्र उनके संरक्षण की दिशा में सकारात्मक परिणाम दे रहा है।

अलग-अलग पॉंड में रखे जाते हैं कछुए
केंद्र के प्रभारी के अनुसार, अंडों को विशेष तापमान और बालूयुक्त मिट्टी में सुरक्षित रखा जाता है। जून माह में अंडों से बच्चे निकलने के बाद उन्हें अलग-अलग पॉन्ड में रखा जाता है। कछुओं को प्रतिदिन लौकी, खीरा, गाजर और मौसम के अनुसार अन्य आहार दिया जाता है। गर्मियों में पानी प्रतिदिन बदला जाता है, जबकि सर्दियों में उन्हें विशेष सुरक्षा दी जाती है क्योंकि इस मौसम में वे अधिक संवेदनशील होते हैं।


ढोर, कटहवा, सुंदरी जैसी दुर्लभ प्रजातियों के कछुओं का संरक्षण
केंद्र में ढोर, कटहवा, सुंदरी, भूतकथा और लाल तिलकहवा जैसी दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण किया जा रहा है। हर वर्ष लगभग 4,500 कछुओं को गंगा नदी में छोड़ा जाता है। इसके अलावा तस्करी से बरामद कछुओं का भी यहां पुनर्वास किया जाता है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले करीब 13 वर्षों में 7,300 से अधिक कछुओं का संरक्षण कर उन्हें सुरक्षित प्राकृतिक आवास में छोड़ा जा चुका है।


वन विभाग का मानना है कि कछुओं का संरक्षण केवल जैव विविधता की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि गंगा की स्वच्छता और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि वाराणसी का कछुआ पुनर्वास केंद्र देश में वन्यजीव संरक्षण और नदी पारिस्थितिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मॉडल के रूप में उभर रहा है।