Ramnagar ki Ramlila: अयोध्या में निकली भव्य बारात, न निमंत्रण की जरूरत न बुलावे का इंतजार, पूरा नगर बन गया बाराती, चहुंओर गूंजी जय-जयकार

रामनगर की रामलीला में बुधवार की शाम कुछ ऐसी उतरी, जैसे समय की धारा पल भर के लिए ठहर गई हो और त्रेता युग फिर से जीवंत हो उठा हो। अयोध्या से प्रभु श्रीराम की बारात निकली तो रामनगर जनकपुर बन गया और हजारों श्रद्धालु बिना किसी औपचारिक निमंत्रण के खुद-ब-खुद बराती बन गए। किसी ने नए कपड़े पहने थे तो किसी के माथे पर चंदन सजा था। इत्र की खुशबू के बीच हर जुबान पर एक ही आग्रह था—‘का हो फलाने, प्रभु के बारात में चलत हऊवा न? चला, ई मौका जीवन में फिर कब मिली।’
 

चारों भाइयों ने धारण किया दूल्हे का स्वरूप, मौर सजाकर घोड़ों पर हुए सवार

द्वारपूजा, परिछन और जनवासे की रस्मों से रामलीला में त्रेता युग हुआ साकार 

वाराणसी। रामनगर की रामलीला में बुधवार की शाम कुछ ऐसी उतरी, जैसे समय की धारा पल भर के लिए ठहर गई हो और त्रेता युग फिर से जीवंत हो उठा हो। अयोध्या से प्रभु श्रीराम की बारात निकली तो रामनगर जनकपुर बन गया और हजारों श्रद्धालु बिना किसी औपचारिक निमंत्रण के खुद-ब-खुद बराती बन गए। किसी ने नए कपड़े पहने थे तो किसी के माथे पर चंदन सजा था। इत्र की खुशबू के बीच हर जुबान पर एक ही आग्रह था—‘का हो फलाने, प्रभु के बारात में चलत हऊवा न? चला, ई मौका जीवन में फिर कब मिली।’

यही रामनगर की रामलीला की सबसे बड़ी खूबसूरती है। यहां दर्शक केवल लीला देखने नहीं आते, बल्कि उसके पात्र और सहभागी बन जाते हैं। श्रीराम की बारात इसका सबसे जीवंत उदाहरण बनी। देखते ही देखते पूरा नगर बारात का हिस्सा बन गया। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और युवा—हर कोई इस अलौकिक यात्रा में शामिल होने को आतुर नजर आया।

चारों भाई दूल्हे के स्वरूप में सजे। सिर पर मौर, चेहरे पर तेज और घोड़ों पर सवार होकर जब बारात जनकपुर की ओर बढ़ी तो वातावरण भक्तिभाव से भर उठा। बैंड-बाजे की धुन, जय श्रीराम के उद्घोष और श्रद्धालुओं की उमंग ने पूरे माहौल को उत्सव में बदल दिया। जनकपुर पहुंचने पर जनवासे की परंपरा निभाई गई। इसके बाद द्वारपूजा, परिछन समेत विवाह की विभिन्न रस्मों का पारंपरिक विधि-विधान से मंचन हुआ। दृश्य इतना स्वाभाविक और आत्मीय था कि लीलाप्रेमियों को लगा मानो वे किसी रामलीला का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वयं उस युग के साक्षी हों।

राम-सीता विवाह के इस प्रसंग ने भक्ति और लोकजीवन को एक सूत्र में पिरो दिया। जनकपुर की गलियों में गूंजते जयकारे, श्रद्धालुओं के चेहरे पर उमड़ती आस्था और बारात में शामिल लोगों की उमंग ने ऐसा दृश्य रचा, जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। मानो उस पल रामनगर में अयोध्या से निकली बारात नहीं, स्वयं आस्था चलकर जनकपुर पहुंची हो।