Ramnagar ki Ramlila: प्रभु श्रीराम ने जटायु को दिया मोक्ष, शबरी को नवधा भक्ति का ज्ञान, हनुमान मिलन के बाद सुग्रीव से की मित्रता

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।। माता सीता के वियोग में वन-वन भटकते प्रभु श्रीराम की यह करुण पुकार रामनगर की रामलीला के 17वें दिन श्रद्धालुओं के हृदय को भावविभोर कर गई। कहीं जटायु के प्रति प्रभु का वात्सल्य दिखाई दिया तो कहीं शबरी की अनन्य भक्ति ने भक्ति की पराकाष्ठा का दर्शन कराया। आगे हनुमान मिलन और सुग्रीव से मित्रता के प्रसंग ने प्रभु की करुणा, मर्यादा और मित्र धर्म को जीवंत कर दिया। जटायु अंत्येष्टि, शबरी मिलन, नारद संवाद, सुग्रीव और हनुमान मिलन के प्रसंगों के साथ लीला का विश्राम हुआ।
 

जटायु की अंत्येष्टि से सुग्रीव की मित्रता तक, रामनगर की रामलीला में छलका भक्ति और करुणा का रस

सात ताड़ के वृक्षों को एक ही बाण से धराशायी कर प्रभु ने सुग्रीव को कराया अपनी शक्ति का विश्वास, वानर समूह के साथ सुग्रीव ने उतारी आरती

वाराणसी। हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।। माता सीता के वियोग में वन-वन भटकते प्रभु श्रीराम की यह करुण पुकार रामनगर की रामलीला के 17वें दिन श्रद्धालुओं के हृदय को भावविभोर कर गई। कहीं जटायु के प्रति प्रभु का वात्सल्य दिखाई दिया तो कहीं शबरी की अनन्य भक्ति ने भक्ति की पराकाष्ठा का दर्शन कराया। आगे हनुमान मिलन और सुग्रीव से मित्रता के प्रसंग ने प्रभु की करुणा, मर्यादा और मित्र धर्म को जीवंत कर दिया। जटायु अंत्येष्टि, शबरी मिलन, नारद संवाद, सुग्रीव और हनुमान मिलन के प्रसंगों के साथ लीला का विश्राम हुआ।

सीता की खोज में प्रकृति से पूछते रहे प्रभु, जटायु को दिया मोक्ष
माता जानकी की खोज में निकले प्रभु श्रीराम वन के पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों, पर्वतों और नदियों से सीता का पता पूछते हैं। इसी बीच घायल जटायु उन्हें माता सीता के हरण का पूरा वृत्तांत सुनाते हैं। जटायु की वीरता और त्याग से द्रवित प्रभु उन्हें सांत्वना देते हैं। जटायु से पिता महाराज दशरथ के पास सीता हरण की बात न कहने का आग्रह करते हुए प्रभु उनकी अंत्येष्टि स्वयं करते हैं। इसके बाद जटायु दिव्य स्वरूप में प्रकट होकर श्रीराम की वंदना करते हैं। यह प्रसंग त्याग, सेवा और प्रभु की भक्तवत्सलता का मार्मिक उदाहरण बना।

शबरी के झूठे बेर में दिखी निष्कपट प्रेम की मिठास
जटायु को मोक्ष प्रदान करने के बाद प्रभु श्रीराम कबंध का उद्धार करते हुए शबरी के आश्रम पहुंचते हैं। वर्षों से प्रभु की प्रतीक्षा कर रहीं शबरी उनके दर्शन पाकर भावविभोर हो जाती हैं। वह प्रेमपूर्वक अपने झूठे बेर प्रभु को अर्पित करती हैं और श्रीराम प्रसन्न मन से उन्हें ग्रहण करते हैं। इसके बाद प्रभु शबरी को नवधा भक्ति का ज्ञान देते हैं। यह प्रसंग बताता है कि प्रभु के लिए आडंबर नहीं, बल्कि भक्त का निष्कपट प्रेम और समर्पण ही सर्वोपरि है।


नारद मोह से भक्ति के मर्म तक पहुंचा संवाद
इसके बाद कथा पंपासर पहुंचती है, जहां नारद जी प्रभु श्रीराम को वन में भटकते देखकर अपने पूर्व श्राप का स्मरण करते हैं। वह प्रभु से प्रश्न करते हैं कि जब वह विवाह करना चाहते थे, तब श्रीराम ने उनके विवाह में बाधा क्यों डाली। प्रभु समझाते हैं कि उस समय नारद माया और काम के वशीभूत हो गए थे। जिस प्रकार मां अपने बच्चे को संकट से बचाती है, उसी प्रकार उन्होंने नारद की रक्षा की थी। इस संवाद में भक्ति, संत-असंत के भेद और प्रभु की कृपा का मर्म सामने आया।

हनुमान ने प्रभु को पहचाना, सुग्रीव से हुई मित्रता
आगे प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़ते हैं। उन्हें देखकर सुग्रीव बाली का भेजा दूत समझते हैं और हनुमान जी को उनका भेद जानने के लिए भेजते हैं। साधु वेश में पहुंचे हनुमान प्रभु के चरणों को पहचान लेते हैं और दोनों भाइयों को अपने कंधों पर बैठाकर सुग्रीव के पास ले जाते हैं। प्रभु के दर्शन पाकर सुग्रीव भावविभोर हो जाते हैं और बाली के साथ हुए विवाद तथा अपने दुखों को उनके सामने रखते हैं। श्रीराम उन्हें अभयदान देते हुए मित्र धर्म का भरोसा दिलाते हैं और बाली वध का निर्णय लेते हैं।

एक बाण से सात ताड़ वृक्ष धराशायी, सुग्रीव का संशय दूर
प्रभु की शक्ति पर विश्वास करने के बावजूद सुग्रीव के मन में संशय बना रहता है। वह कहते हैं कि जो एक ही बाण से सात ताड़ के वृक्षों को गिरा सके, वही बाली का वध कर सकता है। प्रभु मुस्कराते हुए एक बाण चलाते हैं और सातों ताड़ के वृक्ष धराशायी हो जाते हैं। यह दृश्य देखकर उपस्थित लीलाप्रेमी जयकारों से वातावरण गुंजायमान कर देते हैं। लीला के अंतिम दृश्य में वानर समूह प्रभु श्रीराम के पीछे चलता है और सुग्रीव उनकी आरती उतारते हैं। इस तरह 17वें दिन की रामलीला की कथा का विश्राम हुआ।