काशी में रथयात्रा मेले की तैयारियां तेज, नए स्वरूप में दिखेगा भगवान जगन्नाथ का 60 साल पुराना रथ, 16 जुलाई से शुरू होगा तीन दिवसीय मेला

काशी के ऐतिहासिक रथयात्रा मेले की तैयारियां पूरे जोर-शोर से शुरू हो गई हैं। इस वर्ष 16 जुलाई से आरंभ होने वाले तीन दिवसीय मेले के लिए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विराजमान होने वाले 60 वर्ष पुराने यंत्राकार अष्टकोणीय रथ की विशेष मरम्मत और सौंदर्यीकरण किया जा रहा है। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और सुरक्षा को देखते हुए इस बार रथ को पहले से अधिक आधुनिक और सुरक्षित बनाया जा रहा है।
 

रिपोर्ट - ओमकार नाथ

 

वाराणसी। काशी के ऐतिहासिक रथयात्रा मेले की तैयारियां पूरे जोर-शोर से शुरू हो गई हैं। इस वर्ष 16 जुलाई से आरंभ होने वाले तीन दिवसीय मेले के लिए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विराजमान होने वाले 60 वर्ष पुराने यंत्राकार अष्टकोणीय रथ की विशेष मरम्मत और सौंदर्यीकरण किया जा रहा है। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और सुरक्षा को देखते हुए इस बार रथ को पहले से अधिक आधुनिक और सुरक्षित बनाया जा रहा है।

 

रथ पर लगेंगे आठ सीसीटीवी कैमरे, बदला जाएगा हनुमत ध्वज
ट्रस्ट श्री जगन्नाथ जी के सचिव शैलेष त्रिपाठी ने बताया कि वर्ष 1966 में बने करीब 18 फीट ऊंचे सागौन की लकड़ी के रथ की साफ-सफाई, रंग-रोगन और तकनीकी मरम्मत का कार्य शुरू हो चुका है। रथ पर लगा हनुमत ध्वज इस बार बदला जाएगा। इसके साथ ही पुरानी विद्युत व्यवस्था हटाकर नई लाइटें और वायरिंग लगाई जा रही है। बारिश से सुरक्षा के लिए रथ की छतरी भी दुरुस्त की जा रही है।

सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए रथ पर पहले से लगे चार सीसीटीवी कैमरों के अलावा चार नए कैमरे लगाए जाएंगे। इसके बाद रथ पर कुल आठ सीसीटीवी कैमरे हो जाएंगे, जिनकी मदद से मेले के दौरान चारों दिशाओं की गतिविधियों पर निगरानी रखी जाएगी।

1802 में शुरू हुई थी काशी की रथयात्रा
सचिव शैलेष त्रिपाठी ने बताया कि काशी की रथयात्रा परंपरा की शुरुआत 1802 में हुई थी। समय के साथ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने पर पहले के रथ की अपेक्षा बड़ा और अधिक मजबूत रथ बनाया गया। वर्तमान रथ का निर्माण 1966 में सागौन की लकड़ी से किया गया था।

विशेष बात यह है कि परंपरा के अनुसार पुराने रथ की कुछ लकड़ियों को नए रथ में अवश्य शामिल किया जाता है। मान्यता है कि इससे प्रभु के रथ की दिव्यता और ऊर्जा नए रथ में भी बनी रहती है। इसी परंपरा का पालन करते हुए वर्तमान रथ में भी पुराने रथ की लकड़ियों का उपयोग किया गया है। हर वर्ष इसकी मरम्मत और संरक्षण किया जाता है ताकि इसकी मजबूती और ऐतिहासिक स्वरूप कायम रहे। मेला समाप्त होने के बाद रथ को नई रथशाला में सुरक्षित रखा जाएगा।

15 जुलाई को रथ पहुंचेगा मेला स्थल
15 जुलाई की सुबह करीब पांच बजे रथ को रथयात्रा चौराहे स्थित मेला स्थल पर लाया जाएगा। उसी दिन शाम को अस्सी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर से प्रभु की डोली यात्रा पहुंचने के बाद शाम छह बजे वैदिक मंत्रोच्चार के बीच रथ का पूजन होगा।

16 जुलाई की भोर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को विधि-विधान से रथ पर विराजमान कराया जाएगा। इसके बाद उनका विशेष श्रृंगार होगा और सूर्योदय के साथ श्रद्धालुओं के लिए दर्शन-पूजन प्रारंभ हो जाएगा। तीन दिवसीय रथयात्रा मेला 18 जुलाई तक चलेगा।

रथयात्रा के साथ होगी दुर्गा पूजा की शुरुआत
रथयात्रा का पहला दिन केवल भगवान जगन्नाथ की यात्रा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसी दिन काशी में दुर्गा पूजा की तैयारियों का भी शुभारंभ हो जाता है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के अवसर पर कठाम पूजा (खूंटा पूजा) संपन्न की जाएगी, जिसे दुर्गा पूजा की औपचारिक शुरुआत माना जाता है।

पांच प्रकार की मिट्टी से बनेंगी मां दुर्गा की प्रतिमाएं
मूर्तिकार गंगा तट, नदी संगम, तुलसी के पौधे की जड़ तथा अन्य पवित्र स्थानों से लाई गई पांच प्रकार की मिट्टी और लगभग 10 प्रकार की पूजन सामग्रियों के साथ विधिवत पूजा करेंगे। मान्यता है कि इसी दिन मिट्टी में दिव्यता का संचार होता है और मूर्तिकार मां दुर्गा से प्रतिमा निर्माण के लिए क्षमा याचना करते हैं। कठाम पूजा के बाद प्रतिमा निर्माण का कार्य तेज हो जाता है और शहर भर में दुर्गा पूजा पंडालों के निर्माण की शुरुआत भी हो जाती है। काशी में यह परंपरा पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है और वर्षों से धार्मिक आस्था एवं सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।