पिंडदान तो एक बहाना है, असल में अंधे मां-बाप को जगाना है, काशी में 10 हजार अजन्मी बेटियों के लिए पिंडदान

पितृपक्ष की मातृ नवमी पर रविवार को दशाश्वमेध घाट का माहौल धार्मिक अनुष्ठान के साथ सामाजिक चेतना का संदेश देता नजर आया। गंगा तट पर कोख में ही दुनिया से विदा कर दी गईं बेटियों की आत्मा की शांति के लिए विशेष पिंडदान और तर्पण किया गया। आगमन सामाजिक संस्था के तत्वावधान में आयोजित अनुष्ठान में करीब 10 हजार अजन्मी बेटियों के प्रतीकात्मक पिंड बनाए गए। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पिंडदान, तर्पण, पंचबलि और ब्राह्मण भोज कराया गया।
 

दशाश्वमेध घाट पर मातृ नवमी में गूंजा बेटियों के सम्मान का संदेश, 13 वर्षों में 1.60 लाख से अधिक अजन्मी बेटियों का तर्पण

वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अजन्मी बेटियों की आत्मा की शांति के लिए हुआ अनुष्ठान, कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ लिया सामाजिक जागरुकता का संकल्प

वाराणसी। पितृपक्ष की मातृ नवमी पर रविवार को दशाश्वमेध घाट का माहौल धार्मिक अनुष्ठान के साथ सामाजिक चेतना का संदेश देता नजर आया। गंगा तट पर कोख में ही दुनिया से विदा कर दी गईं बेटियों की आत्मा की शांति के लिए विशेष पिंडदान और तर्पण किया गया। आगमन सामाजिक संस्था के तत्वावधान में आयोजित अनुष्ठान में करीब 10 हजार अजन्मी बेटियों के प्रतीकात्मक पिंड बनाए गए। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पिंडदान, तर्पण, पंचबलि और ब्राह्मण भोज कराया गया।

गंगा की मिट्टी से तैयार हुई पिंड वेदी
श्राद्ध पक्ष के अपराह्न काल में मां गंगा की मिट्टी से विशेष पिंड वेदी बनाई गई। गंगाजल, कुशा और अग्नि से भूमि का संस्कार करने के बाद पांच वैदिक आचार्यों के निर्देशन में अनुष्ठान शुरू हुआ। संस्था के संस्थापक सचिव डॉ. संतोष ओझा ने संकल्प लेकर अजन्मी बेटियों की शांति और सद्गति की कामना की।

10 हजार पिंडों में बेटियों को दिया प्रतीकात्मक सम्मान
जौ के आटे, जौ, काले तिल, शहद, घी, शक्कर, दूध और गंगाजल से पिंड तैयार किए गए। सुबह से संस्था के कार्यकर्ता इसकी तैयारी में जुटे रहे। पिंडों को बेटियों के प्रतीक के रूप में स्थापित कर चंदन, फूल-माला, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया गया। इसके बाद वैदिक विधान के अनुसार तर्पण कर उनकी आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना की गई।

विसर्जन के साथ कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ संकल्प
अनुष्ठान के अंतिम चरण में कन्या भ्रूण हत्या और बेटियों के प्रति भेदभाव जैसी सामाजिक कुरीतियों से मुक्ति की कामना की गई। क्षमा प्रार्थना के बाद पिंडों का गंगा में विसर्जन किया गया। आयोजन में बेटियों को जन्म देने, उन्हें समान अधिकार देने और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने का संदेश दिया गया।

13 वर्षों से अभियान चलाने का दावा
संस्था के अनुसार यह अजन्मी बेटियों के लिए आयोजित 13वां वार्षिक पिंडदान अनुष्ठान था। संस्था का दावा है कि पिछले 12 वर्षों में डेढ़ लाख से अधिक अजन्मी बेटियों का तर्पण किया जा चुका है। इस वर्ष 10 हजार पिंडों को शामिल करने के बाद यह संख्या 1.60 लाख से अधिक हो गई।

डॉ. संतोष ओझा ने कहा कि सनातन परंपरा में बेटियों को लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। इसके बावजूद गर्भ में ही बेटियों को समाप्त किया जाना गंभीर सामाजिक चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि यह आयोजन केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि समाज को बेटियों के जीवन और अधिकार के प्रति जागरूक करने का प्रयास है। अनुष्ठान का मार्गदर्शन आचार्य पं. दिनेश दुबे, पं. धनंजय तिवारी और पं. सीताराम ने किया। 

आयोजन में राहुल गुप्ता, हरिकृष्ण प्रेमी, शिव जी, जितेंद्र किरण जादूगर, भानु प्रताप, संतोषी, साधना, कुंदन, लव तिवारी, अजय दूबे, रामबली मौर्य, प्रताप मिश्रा, आशुतोष, अरुण गुप्ता, मदन गुप्ता और लखन समेत कई कार्यकर्ताओं ने सहयोग किया।