एक देश, दीपावली के अनेक रंग: कहीं मां काली की पूजा, कहीं नरकासुर का दहन, जानिए भारत के अलग-अलग राज्यों की अनूठी परंपराएं

दीपावली भारत का ऐसा महापर्व है, जो देश की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक परंपराओं को एक सूत्र में पिरोता है। देश के अलग-अलग राज्यों में दीपावली मनाने के तरीके भले ही अलग हों, लेकिन हर जगह इस पर्व का संदेश एक ही है—अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय। उत्तर प्रदेश में भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी की खुशी में दीप जलाए जाते हैं, तो पश्चिम बंगाल में मां काली की विशेष आराधना होती है। गुजरात में दीपावली के बाद नए साल का स्वागत किया जाता है, जबकि गोवा में नरकासुर के विशाल पुतलों का दहन होता है। आइए जानते हैं देश के अलग-अलग राज्यों में दीपावली की अनूठी परंपराओं के बारे में।
 

Live VNS Special: दीपावली भारत का ऐसा महापर्व है, जो देश की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक परंपराओं को एक सूत्र में पिरोता है। देश के अलग-अलग राज्यों में दीपावली मनाने के तरीके भले ही अलग हों, लेकिन हर जगह इस पर्व का संदेश एक ही है—अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय। उत्तर प्रदेश में भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी की खुशी में दीप जलाए जाते हैं, तो पश्चिम बंगाल में मां काली की विशेष आराधना होती है। गुजरात में दीपावली के बाद नए साल का स्वागत किया जाता है, जबकि गोवा में नरकासुर के विशाल पुतलों का दहन होता है। आइए जानते हैं देश के अलग-अलग राज्यों में दीपावली की अनूठी परंपराओं के बारे में।


उत्तर प्रदेश: भगवान श्रीराम की वापसी की खुशी में जगमगाती है अयोध्या
उत्तर प्रदेश में दीपावली का सबसे गहरा संबंध भगवान श्रीराम से है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, 14 वर्ष का वनवास पूरा करने और रावण का वध करने के बाद भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर पूरी नगरी को रोशन किया था। इसी परंपरा की स्मृति में दीपावली मनाई जाती है। अयोध्या में सरयू तट और राम की पैड़ी पर भव्य दीपोत्सव आयोजित होता है। वहीं काशी में घरों, मंदिरों और गंगा घाटों पर दीप जलाने के साथ भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है।


पश्चिम बंगाल: दीपावली की रात होती है मां काली की विशेष पूजा
पश्चिम बंगाल में दीपावली का स्वरूप उत्तर भारत से कुछ अलग दिखाई देता है। यहां कार्तिक अमावस्या की रात मां काली की आराधना का विशेष महत्व है। कोलकाता सहित राज्य के विभिन्न हिस्सों में काली पूजा के लिए भव्य पंडाल बनाए जाते हैं। मां काली की प्रतिमाओं की स्थापना कर रातभर पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु मां काली से सुख, समृद्धि और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की प्रार्थना करते हैं। घरों और मंदिरों को दीपों तथा रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया जाता है।


गुजरात: दीपावली के बाद नए साल का स्वागत, व्यापारी करते हैं चोपड़ा पूजन
गुजरात में दीपावली धार्मिक आस्था के साथ व्यापारिक समृद्धि का भी प्रतीक है। यहां दीपावली पर माता लक्ष्मी की पूजा के साथ चोपड़ा पूजन की परंपरा है। व्यापारी अपने बहीखातों और लेखा पुस्तकों की पूजा करते हैं। दीपावली के अगले दिन सामान्यतः गुजराती नववर्ष यानी बेस्टू वरस मनाया जाता है। लोग एक-दूसरे को नए साल की शुभकामनाएं देते हैं। हालांकि कुछ वर्षों में पंचांग के अनुसार नववर्ष की तिथि में अंतर हो सकता है। गुजरात में दीपावली को नई शुरुआत और आर्थिक समृद्धि का पर्व माना जाता है।

 

तमिलनाडु: सूर्योदय से पहले स्नान, नरकासुर वध की खुशी में उत्सव
तमिलनाडु में दीपावली की शुरुआत सुबह बहुत जल्दी होती है। यहां नरक चतुर्दशी का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध कर लोगों को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। इसी विजय की खुशी में लोग सूर्योदय से पहले तेल लगाकर स्नान करते हैं। इसके बाद नए वस्त्र पहनते हैं, पूजा करते हैं और मिठाइयां बांटते हैं। कई परिवारों में बड़े-बुजुर्गों से आशीर्वाद लेने की भी परंपरा है।

 

गोवा: नरकासुर के विशाल पुतलों का दहन, रातभर चलता है उत्सव
गोवा में दीपावली का सबसे बड़ा आकर्षण नरकासुर के विशाल पुतले होते हैं। नरक चतुर्दशी से पहले युवा और स्थानीय समितियां नरकासुर के पुतले तैयार करती हैं। कई स्थानों पर इन पुतलों की प्रतियोगिताएं भी आयोजित होती हैं। नरक चतुर्दशी की भोर में पुतलों का दहन किया जाता है। यह भगवान श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय और बुराई के अंत का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद लोग स्नान कर नए वस्त्र पहनते हैं और पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेते हैं।

 

महाराष्ट्र: आकाश कंदील से सजते हैं घर, पांच दिनों तक चलता है उत्सव
महाराष्ट्र में दीपावली की पहचान रंग-बिरंगे आकाश कंदील और पारंपरिक व्यंजनों से होती है। घरों के बाहर आकर्षक कंदील लगाए जाते हैं। यहां वसुबारस, धनतेरस, नरक चतुर्दशी, लक्ष्मी पूजन, बलिप्रतिपदा और भाऊबीज की विशेष परंपराएं हैं। महिलाएं घरों के बाहर सुंदर रंगोली बनाती हैं। दीपावली के अवसर पर चकली, करंजी, लड्डू और अन्य पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। परिवार के लोग एक-दूसरे के घर जाकर शुभकामनाएं देते हैं।

 

पंजाब: दीपावली पर मनाया जाता है बंदी छोड़ दिवस, रोशनी से नहाता है स्वर्ण मंदिर
पंजाब में दीपावली का विशेष संबंध सिख इतिहास से भी है। सिख समुदाय इस अवसर पर बंदी छोड़ दिवस मनाता है। यह पर्व छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब की ग्वालियर किले से रिहाई की स्मृति में मनाया जाता है। मान्यता है कि गुरु हरगोबिंद साहिब ने अपने साथ 52 राजाओं की रिहाई भी सुनिश्चित कराई थी। अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में विशेष रोशनी की जाती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु गुरुद्वारों में मत्था टेकने पहुंचते हैं।

 

कर्नाटक: राजा महाबली की स्मृति में मनाया जाता है बलिपाड्यमी
कर्नाटक में दीपावली के दौरान नरक चतुर्दशी और बलिपाड्यमी का विशेष महत्व है। बलिपाड्यमी का संबंध दानवीर राजा महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा से है। इस दिन कई परिवार राजा महाबली का स्मरण करते हैं। घरों को दीपों और रंगोली से सजाया जाता है। लोग पारंपरिक पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

 

हिमाचल प्रदेश: कुछ इलाकों में एक महीने बाद मनाई जाती है बूढ़ी दिवाली
हिमाचल प्रदेश में दीपावली की एक अनूठी परंपरा देखने को मिलती है। राज्य के सिरमौर, शिमला और कुल्लू क्षेत्र के कुछ गांवों में बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है। कई स्थानों पर यह पर्व सामान्य दीपावली के लगभग एक महीने बाद आयोजित होता है। इस दौरान ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में लोकनृत्य करते हैं। ढोल-नगाड़ों की धुन पर सामूहिक उत्सव मनाया जाता है। यह परंपरा हिमाचल की समृद्ध लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

 

ओडिशा: दीपावली पर पूर्वजों का स्मरण, जलाते हैं कौंरिया काठी
ओडिशा में दीपावली का संबंध पूर्वजों के प्रति श्रद्धा से भी है। यहां कौंरिया काठी जलाने की विशेष परंपरा है। इस अनुष्ठान में लोग पूर्वजों का स्मरण करते हुए उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस अवसर पर पूर्वजों की आत्माओं के लिए प्रकाश अर्पित किया जाता है। इसके साथ ही घरों में दीप जलाए जाते हैं और माता लक्ष्मी तथा भगवान गणेश की पूजा होती है।

 

असम: दीपावली के साथ मां काली की आराधना
असम में भी दीपावली के अवसर पर काली पूजा का विशेष महत्व है। राज्य के विभिन्न हिस्सों में मां काली की प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है। घरों और मंदिरों में दीप जलाए जाते हैं। कई स्थानों पर सामुदायिक पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। यहां दीपावली धार्मिक आस्था और सामूहिक उत्सव का प्रतीक है।

 

बिहार: लक्ष्मी-गणेश पूजन के बाद शुरू होती है छठ महापर्व की तैयारी
बिहार में दीपावली पर घरों की साफ-सफाई, मिट्टी के दीये जलाने और लक्ष्मी-गणेश पूजन की परंपरा है। लोग घरों के मुख्य द्वार पर रंगोली बनाते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा और भाई दूज मनाया जाता है। इसके बाद लोक आस्था के महापर्व छठ की तैयारियां तेज हो जाती हैं। छठ में अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है।

 

राजस्थान: रोशनी से जगमगाते बाजार, अन्नकूट की भी परंपरा
राजस्थान में दीपावली पर घरों, मंदिरों और बाजारों की सजावट विशेष आकर्षण होती है। जयपुर के प्रमुख बाजारों की सामूहिक रोशनी देशभर में प्रसिद्ध है। व्यापारी प्रतिष्ठानों में लक्ष्मी पूजन करते हैं। घरों के आंगन में रंगोली बनाई जाती है और पारंपरिक मिठाइयां तैयार होती हैं। दीपावली के बाद कई स्थानों पर गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव आयोजित होते हैं।

 

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना: नरक चतुर्दशी और दीपों की विशेष परंपरा
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में दीपावली का संबंध नरकासुर वध की पौराणिक कथा से भी है। लोग नरक चतुर्दशी पर सुबह स्नान करते हैं और नए वस्त्र पहनते हैं। घरों को रंगोली और दीपों से सजाया जाता है। कई परिवार माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं। मिठाइयां बांटकर परिवार और पड़ोसियों के साथ त्योहार की खुशियां साझा की जाती हैं।

 

जैन समुदाय के लिए विशेष महत्व, भगवान महावीर के निर्वाण से जुड़ी है दीपावली
दीपावली केवल हिंदू परंपराओं तक सीमित नहीं है। जैन धर्म में भी इस पर्व का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। जैन मान्यता के अनुसार, कार्तिक अमावस्या के दिन भगवान महावीर को निर्वाण प्राप्त हुआ था। इसी स्मृति में जैन समुदाय दीपावली मनाता है। इस अवसर पर मंदिरों में पूजा, प्रार्थना और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

 

परंपराएं अलग, लेकिन दीपावली का संदेश एक
भारत के अलग-अलग राज्यों में दीपावली के स्वरूप और उससे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में भिन्नता देखने को मिलती है। कहीं भगवान श्रीराम के स्वागत में दीप जलाए जाते हैं, कहीं भगवान श्रीकृष्ण की विजय का उत्सव मनाया जाता है, तो कहीं मां काली की आराधना होती है। कुछ क्षेत्रों में यह पर्व नववर्ष, पूर्वजों के स्मरण और लोक संस्कृति से भी जुड़ा है। यही विविधता दीपावली को भारत की सांस्कृतिक एकता का अद्भुत प्रतीक बनाती है। अलग-अलग परंपराओं के बावजूद दीपावली हर जगह प्रकाश, आशा, समृद्धि और खुशियों का संदेश देती है।